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गंदी नाली में लुढ़कासन

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विष्णु नागर

ये खुशफहमी में हैं। खुशफहमी में जीनेवालों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। वे अपने आप लुढ़ककर किसी दिन जमीन पर आ जाएंगे। टांगें ऊपर हों, सिर नीचे हो, तब भी ऐसे लोग खुशफहमी में रहते हैं कि हम पैरों के बल खड़े हैं या कुर्सी पर तनकर बैठे हैं, मगर इनके अलावा सबको मालूम होता है कि ये लुढ़कावस्था में हैं।

लुढ़कावस्था में ही ये भाषण दे रहे हैं, चीख-पुकार मचा रहे हैं, आदेश-निर्देश दे रहे हैं, गालियां बक रहे हैं, अपनी वीरता के गीत गा रहे हैं। सरकार बदलने की बात पर हाय-तौबा मचा रहे हैं। घबराहट में अपने राजनीतिक विरोधी को सिरफिरा कह रहे हैं। नेहा बोरा और नेहा सिंह राठौर जैसी बहादुर स्त्रियों का चरित्र हनन करने की कोशिश कर रहे हैं। सब उनके मन में गहराई से छुपे डर को समझकर इनकी इस हालत पर हंस रहे हैं, इनका मजा़ ले रहे हैं, मगर इन्हें पता नहीं चलता, क्योंकि ये लुढ़कावस्था में पड़े हैं। इनकी हालत ये है कि ये करवट भी नहीं ले पा रहे हैं, पावर के नशे में इतने दयनीय हो चुके हैं।

तो ये लुढ़के पड़े हैं। इन्हें पता नहीं है कि ये जिस जगह लुढ़के पड़े हैं, वह जगह बदबूदार नाली है, जिसकी साल भर में एक बार आधी-अधूरी सफाई होती है। नशे में आदमी हो या समूह या किसी पार्टी का नेता, उन्हें लुढ़कने में सबसे ज्यादा मजा़ उसी जगह पर आता है, जहां नाली होती है। जगह जितनी बदबूदार होती है, उतना ही इन्हें आनंद आता है। एसी का मज़ा मिलता है। तो ये उस जगह लुढ़के पड़े हैं।

जिनका कोई घर होता है, बीवी-बच्चे होते हैं, अंधेरी रात में भी उनके घर वाले नाली-नाली ढूंढ़ते हुए खींच-पकड़कर ले आते हैं, नहला-धुला कर बिस्तर में लिटा देते हैं। इनका तो कभी कोई अपना रहा नहीं। इनका बनने की जिसने भी कोशिश की, उसके साथ इन्होंने दगा किया। ये हमेशा से केवल अपने रहे हैं। जो इनके अपने थे, कभी थे, उन्हें इन्होंने दुत्कारा।

ये आज नाली में उल्टे पड़े हैं, मगर ख्वाब देख रहे हैं कि ये सीधे, तनकर खड़े हैं, होश में हैं और टेलिप्रांप्टर से भाषण दे रहे हैं और देश की जनता इनकी बात बहुत गौर से सुन रही है। इनका डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, जबकि इनका डंका तो अयोध्या में भी बजना बंद हो चुका है, जहां इन्होंने धूमधाम से मंदिर बनवाया था और वहां अब चोर की तरह देखे जा रहे हैं!

इनके पास बारह साल से ज्यादा समय से किसी न किसी झूठ और बेईमानी से सत्ता है, इसलिए लुढ़कावस्था में भी ये खुशफहमी में हैं कि ये पहले से ज्यादा मजबूती से ज़मीन पर खड़े हैं। ज़मीन इनके नीचे है और आकाश इनके ऊपर। ये नशे में हैं और इनका हाल उस फिल्म के हीरो राजकपूर से भी बुरा है, जिसे कम से कम यह अच्छी तरह मालूम था कि वह नशे में है और इसके लिए वह माफी मांग रहा है।

दारू का नशा सुबह उतर जाता है। सत्ता अगर नशा बन जाए, तो वह सत्ता के जाने के बाद भी नहीं उतरता। आधी बेहोशी में अगले पांच साल और उसके बाद के भी पांच साल गुजरते हैं।जिस पार्टी के नेता को पहली बार एक साथ बारह साल से भी अधिक समय तक यह नशा करने का मौका मिला हो, वह कुछ ज्यादा ही खुशफहमी में रहता है, क्योंकि उसने इस दौरान नशा ही नशा किया है और नशा ही करवाया है। नशा ही उसका सनातन है, नशा ही उसका विकास!

इन्हें मुगालता है कि सत्ता में रहने का हर खेल ये जानते हैं। ऐसे नहीं, तो ये वैसे अपने विरोधियों को पटकनी दे देंगे। इन नये-नये लड़के-लड़कियों का सत्ता बदलने का नशा ये चुटकी में हिरन कर देंगे। ये तुर्यावस्था में हैं। बड़ी-बड़ी डींगे मारना इनका स्वभाव है। इन्हें विश्वास है कि यह आंधी और तूफान जल्दी ही थम जाएगा। आकाश फिर साफ़ हो जाएगा। धुंध फिर छंट जाएगी। धूप फिर खिल जाएगी। इनके अच्छे दिन लौट आएंगे। तब ये दिखाएंगे कि चारों ओर कितनी हरियाली है, कितने फूल हैं, कितनी खुशबू है। जनता को तब पीला भी फिर से हरा दिखने लगेगा। बिना गंध के फूलों से महक आएगी। हम कहेंगे कि देखो आकाश नीला है, तो लोग न केवल इसे मानेंगे, बल्कि कहेंगे कि यह नान-बायोलॉजिकल प्रभु की कृपा से नीला है, वरना हमने तो इससे पहले आकाश को हमेशा काला ही देखा है!

चूंकि ये नशे में उल्टे गिरे पड़े हैं, तो इन्हें कभी धर्मेन्द्र प्रधान तो कभी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करने वाले सब आलतू -फालतू लगते हैं। इन्हें लगता है कि एक दिन हमसे लड़ते-लड़ते, मार खाते-खाते, चमड़ी उधड़वाते- उधड़वाते ये थक जाएंगे और हार मान जाएंगे।माफी मांगने आएंगे कि हे नान-बायोलॉजिकल प्रभु, हमें माफ कर दो, हमसे ऐतिहासिक गलती हो गई। हम फारेन फंडिंग का हल्ला मचाएंगे, तो ये चोर की तरह सरपट भागते नज़र आएंगे।जिनके पास काम-धंधा होगा, वे उसमें लग जाएंगे, वरना काम-धंधे के लिए ये इधर-उधर धक्के खाएंगे। हम इन भूतपूर्व आंदोलनकारियों को ब्लैक लिस्ट कर देंगे। न इन्हें सरकारी नौकरी देंगे, न प्राईवेट नौकरी करने देंगे। इन्हें तड़पा-तड़पाकर मार डालेंगे या इनसे संघे शरणम् गच्छामि करवा लेंगे और फिर सब पूर्ववत हो जाएगा। इस तरह 2047 आ जाएगा। उसके बाद 2097 आना शुरू हो जाएगा।

लेकिन जब भी ये थोड़ी देर के लिए होश में आते हैं, तो ये डर से कांपने लगते हैं कि ये साले, छोकरा-छोकरी सब अब हमसे डरते नहीं। हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों से नहीं डरते।हम चालीस-पचास हजार पुलिस आदि लगा देते हैं, तो भी ये खौफ नहीं खाते। मार खाते हैं, मगर रोते नहीं। कहते हैं, जितना मारना हो, मार लो मगर इस सरकार को, इसके चुनाव आयुक्त को बदलवा कर ही रहेंगे। हम मेट्रो और इंटरनेट बंद करवाते हैं तो ये हमसे अदालत में माफी मंगवा लेते हैं। मतदाता सूची की गड़बड़ी ठीक करने का आदेश लेकर खड़े हो जाते हैं। अदालत से पूछवा देते हैं कि बताओ जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला किसने लिया था!पहले सब हमारे बस में था, मगर अब थोड़ा-थोड़ा फिसलता जा रहा है। इसी तरह चला तो सब फिसल जाएगा।

डर के सामने लोग तन कर खड़े हो चुके हैं, सवाल दर सवाल कर रहे हैं। डंडे खा रहे हैं, घसीटे जा रहे हैं, जेल में ठूंसे जा रहे हैं, मगर डर नहीं रहे हैं, बल्कि कह रहे हैं, आओ और डंडे मारो। आओ और आंसू गैस छोड़ो, हम झुकेंगे नहीं। लड़कियां आगे और आगे आ रही हैं, इससे ये और भी अधिक भयभीत हैं। पुलिस से, गुंडों से ये सवाल कर रही हैं। हम पचास साल राज करने आए थे। हर चीज़, हर सांस पर हमने काबू पा लिया था, मगर न जाने कहां से ये आ गए। इनकी गति अब भई सांप छछूंदर केरी है! इन्हें डर खत्म हो जाने से सबसे अधिक डर है, मगर फिर से ये उसी नाली में लुढ़क जाते हैं, जहां इन्हें एसी का मज़ा आता है।

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं।)