डा. दिनेश चन्द्र जोशी
हल्द्वानी। वर्तमान में नेपाल त्रास्दी यानि त्रिशुली नदी का ताड़व फिर से हिमालय की अन्दरूनी आग को उजागर करनें में ताजा उदाहरण है। तथाकथित मीडिया ने खूब बढ़चढ़कर कई दिनों से इसको मुद्दा बना लिया है। इतने मर गये, इतने घायल हो गये, इतने का नुकसान हो गया, इतने शहर-गांव ढूब गये या बह गये, इतना जन-धन का नुकसान हो गया आदि आदि। आम जनता के सामने किसी भी मीडिया ने इस सवाल पर बहस नहीं उठाई कि आखिर ग्लेशियर टुटने का यह क्रम क्यों बढ़ रहा है? एवलांच तो पिछले कई वर्षो से जगह-जगह आ रहे है उत्तराखण्ड मे भी पिछले वर्षो मे कई एवलांच आए है कई जनधन का नुकसान हुआ है और यह खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इस बात पर कोई मीडिया गम्भीर नहीं है कि हिमालय क्यों टूट रहा है।

जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और जलवायु परिवर्तन किन-किन कारणों से हो रहा है। विश्व स्तर पर तो इस विषय पर कई सम्मेलन हो रहे है। लेकिन हिमालय के नजदीकी देशों और राज्यों में इस पर कोई बात नहीं हो रही है। उल्टा इस प्राकृतिक आपदा से निपटने के बजाय सियासी घटनाएं जैसे हल्द्वानी में राहुल गांधी पर मुकदमा दर्ज कर देना, कही मंच को शुद्धिकरण करना जैसे राजनीतिक चर्चाओं में सभी सरकारें जनता को गुमराह करने लगी है। आम जनता को इस बात की समझ अगर स्वतः हो जाती तो फिर हमें इन सरकारों की नीतियों की क्या जरूरत होती? पिछले वर्षो में हिमालय के पर्यावरण विदों ने हिमालय नीति बनाने की मांग की। इस पर जगह-जगह गोष्ठियां हुई और भारत सरकार के स्तर पर भी हिमालय नीति बनाने की घोषणा कर दी गयी। लेकिन आज तक इस नीति पर क्या कदम उठाए गये है यह नहीं बताया गया।

मध्य हिमालय क्षेत्र में तो आम जनता के बीच जल, जंगल और जमीन के वैज्ञानिक दोहन और वैज्ञानिक प्रबन्ध जैसे मुद्दे ही सबसे अहम मुद्दे है। इन्हीं मुद्दों से जलवायु परिवर्तन का रिश्ता है और इसी जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर पिघलने की बात भी वैज्ञानिक जगत में मानी जा रही है। हिमालय क्षेत्र के सभी राज्यों में इस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है कि वो यहां पर जाति, धर्म, मन्दिर, मस्जिद सत्तापक्ष – विपक्ष आदि के राजनीतिक चौंचलों में ना उलझकर अपने क्षेत्र की अहम समस्याओं और जरूरी मुद्दों पर खुलकर चर्चा करें और इन्ही चर्चाओं से समस्याओं का निदान निकाले, लेकिन ऐसा कही नहीं हो रहा है। उल्टा हमारी सरकारे जल, जंगल और जमीन से अपनी आजीविका चलाने वाले और अपनी हवस के लिए इनका अवैज्ञानिक दोहन करने वाले माफियाओं को ना केवल बढ़ावा दे रही है बल्कि उनको मंत्रीमण्डल में शामिल कर नीति निर्धारण के लिए भी आगे ला रही है। अगर हम नदी के किनारे हो रहे अवैध खनन का गहराई से अध्ययन करें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि अंधाधुंध खनन के कारण रेता-बजरी के अवैज्ञानिक दोहन के कारण नदियों का जल स्तर प्रतिवर्ष लगभग 3-4 फिट नीचे जा रहा है। जिससे नदियों पहाड़ियों के किनारे काट रही है जिससे भूस्खलन बढ़ रहा है।

दूसरा बढ़ा मुद्दा हिमालय के प्राकृतिक वातावरण में सी.एफ.सी. पैदा करने वाले वैज्ञानिक कार्यक्रम बढ़ रहे है। लोगों के घरों में अनेक फ्रिज देखे जा रहे है जो सी.एफ.सी. बढ़ाने में सहयोग कर रहे है। वही हाल घरों में लग रहे एयर कंडिसनर आदि का है। जिससे सी.एस.सी. एकट्ठा होकर जलवायु परिवर्तन में योगदान दे रहा है यह जलवायु परिवर्तन ग्लेशियर पिघलाने में कार्य कर रहा है। सरकारों को चाहिए ये था कि उन विषयों को गोष्ठी और सेमीनारों में लेकर वैज्ञानिकों की राय ली जाए और उस पर समुदाय आधारित जागरूकता के कार्यक्रम चलाए जाए, लेकिन ऐसा कही नहीं दिखाई दे रहा है चाहे भारत हो या नेपाल यानि मध्य हिमालय के पर्वतीय राज्य। मैदानी लोग अगर ये समझ रहे है कि यह मुद्दा सिर्फ पहाड़ियों का है तो वह गलत समझ रहे है। क्योंकि हिमालय टूटेगा तो देश बह जाएगा ना पहाड़ बचेगा और ना मैदान। ना माफिया बचेगें और ना सरकार बचेगी। इस बढ़ी आपदा को सरकार समय रहते अगर नहीं समझेगी तो विनाश निश्चित है और इस विनाश का शिकार गोदी मीडिया भी होगा ही जो अपने आर्थिक लाभ कहे या स्वहित के आधार पर आम जनता को गुमराह कर रहा है और जनमुद्दों से लोगों का ध्यान हटा रहा है।
डा. दिनेश चंद्र जोशी, मध्य हिमालय विमर्श के सम्पादक है।






























