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शायरी जो तन्हाई में दिल से निकली और कामयाब हुई है हर दिल तक पहुंचने में

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समीक्षा
पुस्तक का नाम: शायराना स्वयं
विधा: काव्य ( शायरी)
लेखिका: स्मिता साह स्वंय
पुस्तक मूल्य: 250
प्रकाशन: अविचल प्रकाशन
हल्द्वानी

“अब सुर्ख हवाएं भी पसंद आने लगी है मुझे क्योंकि कहीं से एक खुशबू जानी पहचानी सी लगने लगी है”

और वास्तव में जब आप ‘शायराना स्वयं’ पुस्तक को पढ़ते हैं तो आपको भी हर एक पंक्ति जानी पहचानी सी लगती है l

हर एक शायरी आपको जीवन के विभिन्न दौर में ले जाती है
कभी बचपन की याद दिलाती है, कभी दोस्ती के अहसासों को जीवंत करती है और कभी दुनिया के सबसे खूबसूरत रंग मोहब्बत और प्रेम से पाठक को सराबोर कर देती है l

जब हाथ में स्मिता साह ‘स्वयं’जी का काव्य-संग्रह ‘शायराना स्वयं’ आता है, तो ऐसा महसूस होता है कि हम पन्नों की किसी किताब को नहीं बल्कि किसी अपने की डायरी और उसके दिल की धड़कनों को पढ़ रहे हैं।
ये शायरी किताबी या बनावटी नहीं हैं बल्कि जिंदगी के तमाम रंगों खुशी, तन्हाई, और आत्म-मंथन से सीधे निकलकर आई हैं।

इस संग्रह की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका अपनापन है। लेखिका ने रिश्तों की गहराइयों और तन्हाई के दर्द को इतने सरल और सहज शब्दों में पिरोया है कि हर पाठक इनसे खुद को जुड़ा हुआ पाता है। जैसे जब वे कहती हैं
“सुनो ये लव-शव आशिकी में एक बार ये फीलिंग जरूर आती है ना… आसमान में कहीं तो एक चांद मेरे हिस्से का भी होगा l”

यह अंदाज़ सीधा दिल को छू लेता है क्योंकि इसमें कोई भारी-भरकम शब्दजाल नहीं, बल्कि एकदम सच्ची बातचीत जैसी गर्माहट है।

इन कविताओं में समय के बहुरूपीय स्वभाव और तन्हाई का बहुत सुंदर ताना-बाना है। प्रिय से दूरियों का अहसास हो या खुद से मिलने की जिद, हर जगह एक प्यारी सी टीस और सुकून साथ चलता है।
जैसा कि इन पंक्तियों में झलकता है
“तुझे पाना मेरी चाहत नहीं तुझे चाहना मेरी फितरत है… तू चांद है मेरी दिल की जमीन का, जिसे निहारना मेरी किस्मत है।”

इसके साथ ही, ‘वक्त’ और रिश्तों के बदलते रंगों पर गहरी दृष्टि भी इन कविताओं को और परिपक्व बनाती है
जब वे लिखती हैं
“सुना था वक्त के साथ काफी कुछ बदल जाता है, और सच में मैंने देखा है… वक्त के साथ रिश्ते बदलते हुए…”

यह संग्रह केवल प्रेम या विरह तक सीमित नहीं है बल्कि यह टूटने के बाद खुद को फिर से जोड़ने और अपने वजूद को तलाशने की दास्तां भी है। एक ओर जहां भारतीय संस्कृति से जुड़ाव और अपनी शर्तों पर जीने का उल्लास झलकता है “नारी के नारीत्व में गढ़ना पसंद है मुझे, खुले आंचल-सा उड़ना पसंद है मुझे…”,
वहीं दूसरी ओर दुनिया की जिम्मेदारियों के बीच खुद को प्रेम करने का अहसास भी बहुत खूबसूरती से उभरता है “दुनिया के लिए तो हमेशा जिम्मेदार बने हम, अब एक जिम्मेदारी खुद को खुश करने की भी है…”

अगर भाषा शैली की बात करें तो सहजता और संप्रेषण इस संग्रह की आत्मा है l स्मिता साह जी की भाषा अत्यंत सहज, सरल और आम बोलचाल के करीब है जो सीधे पाठक के दिल पर असर करती है। इसमें उर्दू और हिंदी के शब्दों का ऐसा सुंदर सामंजस्य है जो रचनाओं को ‘शायराना’ मिजाज देता है।

लेखिका ने प्रतीक और बिंब का बहुतायत में प्रयाेग किया है l
चाय की प्याली, तन्हाई, रेत की तरह फिसलता वक्त, और यादों की गुल्लक जैसे रोजमर्रा के प्रतीकों का प्रयोग कविता को जीवंत बनाता है।
“तेरे जाने के बाद चाय का शौक भी छूट-सा गया, मगर अब तन्हाइयों में एक प्याली के बहाने अक्सर तेरी यादें दोहरा लिया करते हैं हम।” यह बिंब पाठक को अपनी ओर खींचता है।
रचनाओं का प्रारूप छोटा होने के बावजूद इनका कथ्य बहुत विस्तृत और विचारोत्तेजक है। यह कम शब्दों में बड़ी बात कह देने की शैली को पुष्ट करता है।

संक्षेप में कहें तो ‘शायराना स्वयं’ कोई आम कविताओं की किताब नहीं है; यह एक ऐसा सफर है जो अपनों के करीब भी लाता है और खुद से भी मिलाता है। इसे पढ़कर ऐसा लगता है मानो कोई बहुत अपना सा शख्स सामने बैठकर अपने दिल का हाल सुना रहा हो l
संवेदनशील पाठकों के लिए एक बेहद सुकून भरा और अपना सा अनुभव है ये पुस्तक l
स्मिता साह जी की प्रथम कृति होने के बावजूद वे अपनी लेखनी से पाठकों को
बांधे रखने में पूरी तरह से सक्षम रही हैं l अपनी पहली ही पुस्तक में उन्होंने अपने भीतर की लेखिका की उत्कृष्ट
संभावनाओं का परिचय दिया है l
उनकी शायरियां एक शांत सरिता की भांति आगे बढ़ती है और पाठक के हृदय को विविध एहसासों से सिंचित करती है l इसलिए प्रत्येक पुस्तक प्रेमी के पास यह पुस्तक होनी ही चाहिए l

मैं स्मिता साह जी को एक लेखिका के रूप में उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं l इस भागदौड़ भरे जीवन में पाठकों को ‘शायराना स्वयं’ के रूप में एक सुखद ठहराव प्रदान करने के लिए अंतःकरण से बहुत बधाई l

शशि कुड़ियाल चंद्रभा
शिक्षिका, कवयित्री /लेखिका(देहरादून उत्तराखंड)
सह सचिव: संपर्क संस्थान