Home उत्तराखंड सच में, आ गया है नया प्रोडक्ट – “विज्ञापनजीवी पत्रकारिता” ?

सच में, आ गया है नया प्रोडक्ट – “विज्ञापनजीवी पत्रकारिता” ?

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जिसकी कीमत पर बिकता है, उसी की जय बोलती है

आज की पत्रकारिता खबर नहीं बेचती, प्रोडक्ट बेचती है और उत्तराखंड जैसे छोटे बाजार में तो प्रोडक्ट सिर्फ दो ही हैं – भाजपा और कांग्रेस। जिसके गोदाम में जो माल है, उसी का विज्ञापन चल रहा है। पत्रकारिता अब मिशन नहीं, कमीशन है।

विचित्र है यह नया व्यापार मॉडल। पहले दिन एक ईमानदार अखबार लिखता है – “फलां विभाग में भ्रष्टाचार का बोलबाला”। दूसरे दिन उसी विभाग का अफसर नौ व्यापारी पत्रकारों को दाना-पानी डालता है, और तीसरे दिन हेडलाइन पलट जाती है – “फलां विभाग : ईमानदारी की मिसाल, कार्यप्रणाली अनुकरणीय।” एक सच के मुकाबले नौ झूठ। लोकतंत्र का यही नया गणित है।

मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की आरटीआई ने परतें खोलीं। किसे कितना बांटा, किस चहेते को कितना नवाजा – कागज चीख-चीख कर बता रहे हैं। पर कागज की चीख टीवी के शोर में दब जाती है। क्योंकि मीडिया अब सवाल नहीं पूछता, सर्टिफिकेट बांटता है। अरबों के विज्ञापन के बदले।

नौकरशाहों का तो कहना ही क्या। कुर्सी का मतलब ही नहीं पता, पर कुर्सी की कीमत खूब पता है। पद की गरिमा क्या होती है, यह नहीं जानते, पर पद से वसूली कैसे होती है, इसमें पीएचडी हैं। और इनकी आरती उतारने के लिए हर चौराहे पर कैमरा और माइक तैयार खड़ा है।

पत्रकारिता की आड़ में अब प्रॉपर्टी डीलर, होटलियर, खनन कारोबारी पल रहे हैं। कलम इनके लिए लाइसेंस है, लाइसेंस टू प्लीज़। नेता खुश, अफसर खुश, तो धंधा खुश। जनता? जनता तो कंटेंट है।

प्रदेश कर्ज में है। युवा बेरोजगार है। महंगाई आसमान पर है। नौकरियां गुजरात और लखनऊ वालों को बेची जा रही हैं। पहाड़ लुट रहा है। पर पर्दे पर सब चंगा सी। क्योंकि दर्जाधारियों की लिस्ट लंबी है और कैमरे का एंगल फिक्स है।

और विपक्ष? वह भी इसी लूट का साइलेंट पार्टनर है। उसे सत्ता नहीं, सत्ता का इंतजार है। वह भी जानता है कि कल उसकी बारी आएगी, तो यही बिकाऊ माइक उसकी भी जय-जयकार करेंगे। इसलिए वह भी चुप है। सह-अपराधी वाली चुप्पी।

2027 की कुर्सी की लड़ाई शुरू हो चुकी है, और इस लड़ाई में जनता दर्शक है, पत्रकारिता बिकाऊ टिकट।