हार्ट अटैक के मरीज से नकद वसूली के आरोप पर डीएम-सीएमओ ने बैठाई 3-सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच
हल्द्वानी (नैनीताल)। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना ‘आयुष्मान भारत – अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना’ के क्रियान्वयन को लेकर कुमाऊं के प्रमुख चिकित्सा केंद्र हल्द्वानी में एक बड़ा विवाद सामने आया है। मुखानी क्षेत्र स्थित ‘द प्राइड हॉस्पिटल’ और वहां कार्यरत कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने गंभीर रूप से पीड़ित एक हृदय रोगी को आयुष्मान योजना के तहत कैशलेस उपचार देने का भरोसा देकर भर्ती कराया, लेकिन बाद में प्रक्रिया को बीच में रोककर परिजनों से लगभग ₹1.5 लाख नकद की जबरन मांग की। सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट पीयूष जोशी द्वारा इस मामले की विस्तृत शिकायत जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) नैनीताल को सौंपे जाने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने तीन वरिष्ठ चिकित्साधिकारियों की एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन कर दिया है।
पीड़ित तीमारदार हिमांशु कुनियाल के बयानों और प्रशासनिक शिकायत के अनुसार, यह घटना 13 अगस्त की है जब उनके रिश्तेदार श्री विनोद चन्द्र जोशी को अचानक सीने में गंभीर दर्द उठा। परिजन उन्हें तत्काल डॉ. सौरभ शर्मा के निजी क्लिनिक ले गए, जहां प्रारंभिक जांच के बाद डॉक्टर ने मरीज को गंभीर हार्ट अटैक की पुष्टि करते हुए तत्काल स्टेंट (छल्ला) डालने की आवश्यकता बताई और इसका अनुमानित खर्च लगभग ₹1.5 लाख बताया। जब तीमारदारों ने असमर्थता जताते हुए आयुष्मान भारत कार्ड से उपचार कराने का अनुरोध किया, तो डॉक्टर ने स्टेंट की प्रक्रिया आयुष्मान से करने की सहमति दी, लेकिन एंजियोग्राफी के लिए ₹15,000 नकद देने की शर्त रखी। इसके बाद डॉक्टर के निर्देश पर मरीज को निजी वाहन से तुरंत ‘द प्राइड हॉस्पिटल’ ले जाया गया।
अस्पताल में मरीज के भर्ती होते ही प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर वसूली का खेल शुरू हो गया। परिजनों का आरोप है कि विभिन्न प्रारंभिक जांचों और दवाओं के नाम पर मात्र दो घंटे के भीतर तीमारदारों से करीब ₹35,000 नकद वसूल लिए गए और कई जांचों के पक्के बिल भी उपलब्ध नहीं कराए गए। इसके बाद जब एंजियोग्राफी पूरी हो गई और जीवनरक्षक स्टेंट डालने का समय आया, तो डॉ. सौरभ शर्मा अपने पूर्व वादे से पूरी तरह मुकर गए। डॉक्टर ने परिजनों से दो-टूक कहा कि अस्पताल में आयुष्मान योजना लागू नहीं होगी और आगे की प्रक्रिया तभी संभव होगी जब वे तत्काल लगभग ₹1.5 लाख नकद काउंटर पर जमा कराएंगे। जीवन-मरण के संकट में फंसा परिवार इस अप्रत्याशित वित्तीय दबाव से स्तब्ध रह गया।
गंभीर चिकित्सकीय आपातकाल के दौरान अस्पताल द्वारा हाथ खड़े किए जाने पर तीमारदारों ने मरीज की जान को जोखिम में न डालते हुए तत्काल प्राइड हॉस्पिटल से डिस्चार्ज की मांग की। इसके उपरांत सामाजिक कार्यकर्ता पीयूष जोशी के हस्तक्षेप और त्वरित समन्वय से मरीज को हल्द्वानी स्थित ‘साईं अस्पताल’ ले जाया गया। साईं अस्पताल प्रबंधन ने मरीज का आयुष्मान कार्ड स्वीकार करते हुए शत-प्रतिशत कैशलेस व्यवस्था के तहत आपातकालीन प्रक्रिया शुरू की, जहां उनकी सफल बाईपास/कार्डियक सर्जरी संपन्न हुई और वर्तमान में मरीज पूर्णतः स्वस्थ हैं। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि मरीज की स्थिति पूरी तरह से योजना के मानकों के अनुकूल थी, लेकिन प्राइड हॉस्पिटल द्वारा निजी लाभ के लिए इलाज को रोका गया।
विधिक अभिलेखों के अनुसार, द प्राइड हॉस्पिटल राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA) एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) के पोर्टल पर कार्डियोलॉजी, कार्डियोवस्कुलर इनपेशेंट केयर, आईसीयू और जनरल मेडिसिन के लिए आधिकारिक रूप से इम्पैनल्ड है। NHA के दिशानिर्देशों के तहत किसी भी सूचीबद्ध निजी अस्पताल द्वारा योजना के तहत कवर की गई बीमारियों के लिए एक भी रुपया नकद लेना अनुबंध (MoU) का सीधा उल्लंघन है, जिसे एंटी-फ्रॉड नियमों में ‘टियर-1 गंभीर धोखाधड़ी’ की श्रेणी में रखा गया है। इसके बावजूद, गंभीर हृदय रोगी को आपात स्थिति में नकद भुगतान न करने पर इलाज से वंचित करने का प्रयास क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट और नेशनल मेडिकल कमीशन की आचार संहिता का भी खुला उल्लंघन माना जा रहा है।
मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों, ऑडियो रिकॉर्डिंग और बिलों का संज्ञान लेते हुए मुख्य चिकित्सा अधिकारी नैनीताल ने आदेश पत्रांक सी-2/2026-27/4991 के तहत त्रि-सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित कर दी है। इस समिति में वरिष्ठ चिकित्साधिकारी (संयुक्त निदेशक ग्रेड) डॉ. रजत भट्ट को अध्यक्ष, बेस चिकित्सालय हल्द्वानी की फिजीशियन डॉ. विनीता निखुर्पा को सदस्य और सीएमओ कार्यालय की वरिष्ठ चिकित्साधिकारी डॉ. रेनू सूठा को सदस्य नामित किया गया है। जांच समिति को निर्देश दिए गए हैं कि अस्पताल के 13 अगस्त के भर्ती रजिस्टर, कैश रसीदें, सीसीटीवी फुटेज और आयुष्मान टीएमएस पोर्टल के डेटा को सुरक्षित कर विस्तृत आख्या तत्काल शासन को प्रस्तुत की जाए।
इधर, शिकायतकर्ता पीयूष जोशी ने जिलाधिकारी, सीएमओ और राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भेजे अपने आधिकारिक प्रतिवेदन में मांग की है कि जांच निष्पक्षता से पूरी करते हुए मरीज के परिजनों से वसूली गई अवैध धनराशि 18% ब्याज सहित वापस कराई जाए। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि निजी अस्पताल सरकारी योजना का नाम लेकर गरीबों से अवैध उगाही कर रहे हैं, तो प्राइड हॉस्पिटल का आयुष्मान पैनल तुरंत प्रभाव से स्थायी रूप से निरस्त (De-empanel) किया जाए और संबंधित चिकित्सक के खिलाफ उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में लाइसेंस निलंबन की संस्तुति भेजी जाए। इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद क्षेत्र के अन्य निजी चिकित्सालयों में भी हड़कंप मचा हुआ है।
स्वास्थ्य महकमा मौन, निजी अस्पतालों की मौज?
अब प्रश्न यह उठता है कि इस तरह की गम्भीर शिकायतें आए दिन देखने को मिल रही हैं, इस पर स्वास्थ्य महकमा क्या कर रहा है, यह भी अपने आप में गम्भीर प्रश्न चिन्ह स्वास्थ्य विभाग पर खड़े कर रहा है। यानि स्वास्थ्य विभाग भी कहीं ना कहीं इस तरह के निजी अस्पतालों पर लगाम लगाने के बजाय आँखों पर पट्टी और कानों में रुई डाले बैठा है। विभाग का हाल यह है कि जब तक मीडिया में शोर न मचे या कोई मंत्री नाराज न हो, तब तक फाइलें टेबल से नहीं हिलतीं। क्या आयुष्मान योजना गरीबों के इलाज के लिए है या निजी अस्पतालों के पोषण के लिए? और क्या स्वास्थ्य विभाग नियामक है या इन अस्पतालों का संरक्षक? यह जनता खुद तय करे।































