Home उत्तराखंड ‘सात फेरे’ : रिश्तों की परतों और मानवीय संवेदनाओं को खोलती कहानियाँ

‘सात फेरे’ : रिश्तों की परतों और मानवीय संवेदनाओं को खोलती कहानियाँ

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कहानी केवल घटनाओं का क्रम नहीं होती, वह अपने समय और समाज का आईना भी होती है। जब कोई लेखक सामान्य जीवन में घटती छोटी-छोटी घटनाओं, रिश्तों की अनकही पीड़ाओं और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व को कथा का आधार बनाता है, तब कहानी पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपने आसपास के जीवन को नए ढंग से देखने के लिए प्रेरित करती है। शशि कुड़ियाल की कहानी-पुस्तक ‘सात फेरे’ इसी दृष्टि से उल्लेखनीय कृति है।

पुस्तक का शीर्षक ‘सात फेरे’ भारतीय वैवाहिक परंपरा का परिचित प्रतीक है, लेकिन लेखिका इन फेरों को केवल विवाह की रस्म तक सीमित नहीं रखतीं। उनके लिए रिश्ते विश्वास, समर्पण, सम्मान, जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव से निर्मित होते हैं। पुस्तक की कहानियों में विवाह और परिवार के साथ-साथ स्त्री की अपनी पहचान और मनुष्य के रूप में उसके सम्मान का प्रश्न भी बार-बार सामने आता है। शीर्षक कहानी में वसुंधरा का चरित्र इसका अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। वह व्यक्तिगत सुख-दुःख से आगे बढ़कर परिवार, बच्चों और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाती है तथा आगे चलकर पहाड़ी हस्तशिल्प और जड़ी-बूटियों से जुड़ा सहकारी केंद्र स्थापित कर ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग बनाती है।

सामाजिक दृष्टि से

‘सात फेरे’ की सबसे बड़ी विशेषता इसका सामाजिक सरोकार है। कहानियाँ किसी बहुत दूर की काल्पनिक दुनिया में नहीं जातीं, बल्कि हमारे घरों, परिवारों और समाज में मौजूद परिस्थितियों को कथा का रूप देती हैं।

‘सिर्फ तुम’ जैसी कहानी दांपत्य जीवन में मौजूद उपेक्षा, अधिकार-बोध, ईर्ष्या और भावनात्मक दूरी को सामने लाती है। सुधीर और सुमिता के संबंधों के माध्यम से लेखिका यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या पत्नी केवल पति की अपेक्षाओं को पूरा करने वाली व्यक्ति है या उसकी अपनी स्वतंत्र भावनाएँ, इच्छाएँ और आत्मसम्मान भी हैं? कहानी आगे चलकर पुरुष के आत्मबोध और पश्चात्ताप की यात्रा बन जाती है।

यहाँ लेखिका स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि रिश्तों के भीतर घटती छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से सामने लाती हैं। यही उनकी सामाजिक दृष्टि को प्रभावी बनाता है।

शीर्षक कहानी में भी सामाजिक प्रश्नों का विस्तार दिखाई देता है। वसुंधरा का शहरी, स्वतंत्र और कलात्मक जीवन से पहाड़ी ग्रामीण परिवेश में आना, बच्चों और वृद्ध सास-ससुर को अपनाना तथा बाद में ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना स्त्री की भूमिका को केवल पत्नी या बहू की पारंपरिक सीमाओं से बाहर ले जाता है।

भावनात्मक दृष्टि से

इस संग्रह की कहानियों का सबसे प्रभावशाली पक्ष इनकी संवेदनात्मकता है। लेखिका पात्रों के बाहरी व्यवहार के पीछे छिपी मनःस्थितियों को पकड़ने का प्रयास करती हैं।

‘सिर्फ तुम’ में सुमिता की चुप्पी, उसका भीतर-ही-भीतर टूटना और अंततः उसके न रहने के बाद सुधीर का अपनी भूलों को समझना पाठक को भीतर तक छूता है। यहाँ पीड़ा किसी बड़े नाटकीय संवाद से नहीं, बल्कि रिश्ते में धीरे-धीरे पैदा हुई दूरी और देर से हुए आत्मबोध से उत्पन्न होती है।

इसी तरह ‘सात फेरे’ में वसुंधरा का जीवन प्रेम, त्याग, मातृत्व, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता के अनेक स्तरों से गुजरता है। विक्रम की मृत्यु के बाद भी वह टूटकर समाप्त नहीं होती, बल्कि अपने जीवन को एक नए उद्देश्य में बदल देती है। उसकी व्यक्तिगत त्रासदी धीरे-धीरे सामाजिक शक्ति में परिवर्तित होती है।

यही कारण है कि संग्रह की कहानियाँ पाठक को केवल दुखी नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य और रिश्तों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं।

साहित्यिक दृष्टि से

साहित्यिक स्तर पर शशि कुड़ियाल की भाषा सरल, सहज और संवादधर्मी है। उनकी कथा-शैली में जटिल शब्दावली या अनावश्यक अलंकरण के बजाय जीवन के सामान्य शब्दों और बातचीत को महत्व दिया गया है। इससे पात्र पाठक के परिचित लगते हैं।

कहानियों में संवादों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पति-पत्नी के बीच होने वाली बातचीत के माध्यम से उनके मन की गांठें खुलती हैं और पात्रों का मनोविज्ञान सामने आता है। घटनाओं के साथ-साथ पात्रों की मानसिक यात्रा भी कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि लेखिका ग्रामीण और शहरी दोनों जीवन-परिसरों को कथा में स्थान देती हैं। विशेष रूप से ‘सात फेरे’ में पहाड़, गाँव, परिवार, स्थानीय जीवन और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रसंग कहानी को स्थानीय रंग और सामाजिक विस्तार प्रदान करता है।

हाँ, साहित्यिक दृष्टि से कहीं-कहीं कथा का संदेश पात्रों के माध्यम से स्वतः उभरने के बजाय थोड़ा प्रत्यक्ष और आदर्शवादी हो जाता है। कुछ प्रसंगों में पात्रों का त्याग और परिवर्तन वास्तविक जीवन की जटिलताओं की अपेक्षा अधिक आदर्श रूप में दिखाई देता है। लेकिन यही बात इन कहानियों को एक स्पष्ट मानवीय और सकारात्मक दृष्टिकोण भी देती है।

स्त्री-चेतना का स्वर

इस संग्रह की एक विशेष उपलब्धि इसका स्त्री-केन्द्रित संवेदनात्मक पक्ष है। यहाँ स्त्री केवल पीड़ित नहीं है। वह प्रेम करती है, प्रश्न करती है, अपने सम्मान की रक्षा करती है, निर्णय लेती है और परिस्थितियों के बदल जाने पर स्वयं को नए रूप में गढ़ती भी है।

वसुंधरा का चरित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह अपने जीवन के व्यक्तिगत नुकसान को समाज के लिए उपयोगी कार्य में बदल देती है और अंततः गाँव के नेतृत्व की जिम्मेदारी भी संभालती है। इस तरह कहानी स्त्री को त्याग की प्रतिमा से आगे बढ़ाकर नेतृत्व और आत्मनिर्भरता की भूमिका में स्थापित करती है।

समग्र मूल्यांकन

‘सात फेरे’ मूलतः रिश्तों की किताब है—लेकिन केवल पति-पत्नी के रिश्तों की नहीं, बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच विश्वास, सम्मान, जिम्मेदारी और संवेदना के रिश्तों की।

शशि कुड़ियाल की कहानियाँ हमें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि रिश्तों को निभाना केवल साथ रहना नहीं है। किसी के साथ होना, उसे समझना, उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करना और समय रहते उसके मन को पढ़ पाना भी रिश्ते की उतनी ही बड़ी आवश्यकता है।

इस संग्रह की कहानियों में कहीं प्रेम अधूरा है, कहीं दांपत्य में दरार है, कहीं अकेलापन है, कहीं पछतावा है और कहीं जीवन को फिर से अर्थ देने का साहस। इसलिए ‘सात फेरे’ को केवल कहानी-संग्रह कहना पर्याप्त नहीं होगा; यह हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन के उन कोनों में झाँकने का प्रयास है, जिन्हें हम अक्सर देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं।

शशि कुड़ियाल की ‘सात फेरे’ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसकी कहानियाँ समाप्त होने के बाद भी पाठक के भीतर चलती रहती हैं—कभी एक प्रश्न बनकर, कभी एक पीड़ा बनकर और कभी एक उम्मीद बनकर।

समीक्षक: ललिता कापड़ी (हल्द्वानी,उत्तराखंड)
लेखिका: शशि कुड़ियाल
प्रकाशक: अविचल प्रकाशन
मूल्य: 400 रूपये मात्र