उत्सव दिल्ली में, उधारी उत्तराखंड में
जिसे समझा था नायक, उसी ने अपनों को डुबोया कर्ज में
देहरादून / नई दिल्ली । देश आज प्रधानमंत्री जी का जन्मदिन सेवा पखवाड़े के रूप में मना रहा है। चारों तरफ पोस्टर हैं, ज्ञान की गंगा बह रही है, और यूजीसी विश्वविद्यालयों को विश्वगुरु बनाने की नई गाइडलाइन में व्यस्त है और इधर उत्तराखंड में विकास अपने पूरे शबाब पर है। प्रदेश की कहानी अब विकास की नहीं, उधारी की कहानी बन गई है। भ्रष्टाचार चरम पर है, बेलगाम नौकरशाह हावी है। जिस पर भरोसा करके पूरे प्रदेश की कमान सौंपी थी, जिसको पहाड़ का सपूत, ईमानदार चेहरा कहकर गद्दी पर बैठाया था, उसी ने आज अपने ही लोगों को कर्जदार बनाकर छोड़ दिया है। सरकार का काम तो फीता काटकर पूरा दिखा दिया गया, फोटो खिंच गई, अखबार में वाहवाही छप गई। इस वाहवाही के चक्कर में अरबों लूट गये। लेकिन उस काम को जमीन पर उतारने वाले ठेकेदार, मजदूर, सप्लायर को आज तक उसका दाम नहीं मिला। सरकारी फाइलों में काम ‘पूर्ण’ है, लेकिन ठेकेदार की जेब ‘खाली’ है। प्रदेश की स्थिति तो ऐसी है कि प्रशिक्षित बेरोजगार 105 दिनों से अनिश्चितकालीन धरने पर है और सुनवाई को उत्तराखंड प्रदेश के मुखिया के पास समय ही नहीं?
ठेकेदार ने बाजार से ब्याज पर पैसा उठाया, मटेरियल उधारी पर लाया, मजदूरों को अपने घर से पैसा देकर काम कराया, और अब दफ्तरों के चक्कर काटते हुए जवाब मिलता है – बजट नहीं है। एक तरफ प्रदेश पर हजारों करोड़ का कर्ज बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ सरकार ने सरकारी काम करने वालों के सिर पर भी कर्ज का बोझ लाद दिया है और आम जन? महंगाई दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रही है, सिलेंडर से लेकर टमाटर तक सब अमृतकाल में सोना बने हुए हैं। भ्रष्टाचार तो अब भ्रष्टाचार नहीं रहा, सिस्टम का शिष्टाचार बन गया है। स्थिति यह है कि जो कल तक दूसरों को पप्पू समझकर हंसते थे, आज वही कार्यकर्ता फाइलों में उलझे, ठेकेदारों से मुंह छिपाते और कर्ज के आंकड़ों में फंसकर खुद ही पप्पू बनते नजर आ रहे हैं।
जन्मदिन मुबारक हो। प्रदेश कर्ज में है, ठेकेदार कतार में है, और जनता लाइन में है।































