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ख्वाब नहीं देख पाने की विवशता और देखने के लिए उत्प्रेरक है यह काव्य संग्रह

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पुस्तक का नाम – ” मैं ख्वाब देखती हूँ “( काव्य संग्रह)
कवयित्री-ललिता कापड़ी
वर्ष – 2026
प्रकाशक – अविचल प्रकाशक, नैनीताल
मूल्य – 360/

ललिता जी की सरल भाषा में लिखी कविताएँ जीवन के ऊहापोह में खोते हुए ख्वाबों का कारण रसोई घर से खोज निकालती हैं, जो चीनी जैसी मीठी और चाय जैसी कड़क हो।

भाड़ में गई वो अंगड़ाई
मरने की फुरसत है नहीं
कैसे देखूँ ख्वाब कोई
एक चुल्हे पर चाय रखी
दूजे पर रखी कड़ाही
देखो भागमभाग बड़ी है
उगता सूरज याद नहीं
ढलता सूरज दिखा नहीं
ब्रेकफास्ट ,लंच, डिनर
उपर से ये जाॅब मेरी है
मरने की फुरसत है नहीं
कैसे देखूँ ख्वाब कोई।

दुनिया के दाँव- पेंच और विवाद के कारण कोई दूसरा नहीं स्वंय आदमी ही है, जो अपने भीतर परिवर्तन नहीं कर पाता और वह मिश्री न बनने की जिद में घुल नहीं पाता, बिना घुले मिलाप भी तो संभव नहीं है।

धीरे से ही तो चलना नहीं आता
सारे फसाद की जड़ ही यही है।
आवाज नीची रखूँ कैसे?
मिश्री सा घुल जाऊँ तो
मिल जाएगी दुनिया
अब कैसे समझाऊँ किसी को
ये दुनिया मेरी मंजिल ही नहीं है।

यही दुनियादारी को चक्रव्यूह समझकर कवि अपने ख्वाबों को उससे बचाने की कोशिश करती रहती है। इतना ही नहीं उम्र और ख्वाब के द्वंद्व को जीने का प्रयास भी करती हैं।स्त्री के जीवन में प्रेम भी विविध रुप लेकर आता है। प्रेम में समझदारी को नकारती हुई, एक अल्हड़ प्रेम का प्रतिपादन करना चाहती है, पर समझदारी अभिनय बन कर जुड़ गया अस्तित्व में और फिर—-

समझदार बनने की कोशिश करती रही
परंतु प्रेम मरता ही गया
दिन पर दिन
शेष रह गया तो सिर्फ नाटक
और एक समझदार औरत

कवि ने स्त्री के प्रति एकतरफा नीति को झेलने का दंश साइकिल की सवारी से कार तक की यात्रा में लिख कर बेटा- बेटी के द्वंद्व रेखा पर एक संधि रेखा खींच दी है।

मैंने अपने उन रिश्तों को
उलझते देखा बेकारी में
तन के हर रिश्ते को
पनपते देखा लाचारी में
जीवन इतना सरल कहाँ था
जितना बचपन में सोचा था
रास्ता इतना सीधा कब था
जिसको घर बैठे देखा था।

स्त्रियों के लिए घर बनाने का ख्वाब, माँ से मिला जुगनूँ का बीज, पहाड़ की महिलाएँ जो निरंतर काम कर रही हैं और पुरुष तास खेलते, शराब पीते, बेटा न होने पर कोसते हुए, और महिलाएँ एक ओर जहाँ बीमारी भूखमरी से जूझते आत्महत्या कर रही हैं, वहीं पुरुष दूसरा विवाह रचा कर दुल्हा बन रहा है। वहीं बड़े घर की स्त्रियाँ मैनी क्वीन से अधिक कुछ नहीं बन पा रहीं हैं ।

बड़े घर की स्त्रियाँ
सजी संवरी गहनों से लदी
किट्टी पार्टी घूमने- फिरने में लगी
अपनी बड़ी बड़ी डिग्रियों को
लाॅकर में संभालने वाली स्त्रियाँ
दो बच्चों को पालने में
पूरी उम्र खर्च करती
मुझे बड़े बड़े शो रुम में खड़ी
” मैनी क्वीन ” जैसी प्रतीत होती हैं।
जिन्हें बनाने में माता- पिता की
एक उम्र खर्च हो गई।

इस संकलन की सभी 107 रचनाएँ पढ़कर एक जिंदगी की करीब से अनुभूति होगी, जिसमें माँ बार-बार आएगी, देशप्रेम पर बहुत कुछ होगा। पहाड़ का दर्द और दर्शन , रोजनामचे का लेखा- जोखा, स्त्री के विविध रुप, बसंत, पुरुष की परिभाषा, दीप, पहाड़ों की पुकार सलीकेदार औरत और विविध विषय हैं, जो रोचक और सरल शैली में शामिल होने में सक्षम हैं। इनकी रचनाएँ किसी ब्युटी पार्लर से थ्रेडिंग कराकर नहीं, सहज जिजीविषा बन कर आई हैं, ख्वाब देखने।

डाॅ शुभदा पांडेय
( वरिष्ठ साहित्यकार व शिक्षाविद)
आगरा- उत्तर प्रदेश
मोबाइल-9528269196