Home उत्तराखंड उत्तराखंड: ‘12 साल’ के बहाने 2027 का प्रचार

उत्तराखंड: ‘12 साल’ के बहाने 2027 का प्रचार

105
Oplus_131072

सरकारी खर्च पर भाजपा का मिशन

देहरादून। मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के कार्यक्रम को उत्तराखंड भाजपा ने 2027 विधानसभा चुनाव की लॉन्चिंग पैड बना लिया है। कैबिनेट विस्तार से लेकर मंत्री-विधायकों के दौरे तक, सरकारी मंच और संसाधन खुलकर पार्टी प्रचार में इस्तेमाल हो रहे हैं। वहीं उत्तराखंड क्रांति दल और आमजनमानस इसे सरकारी धन का सरासर दुरुपयोग बता रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल में पांच विधायकों मदन कौशिक, खजान दास, राम सिंह कैडा, प्रदीप बत्रा और भरत चौधरी को मंत्री बनाया। गढ़वाल, कुमाऊं और मैदानी-पर्वतीय संतुलन का हवाला दिया गया, लेकिन अंदरखाने इसे 2027 की चुनावी टीम तैयार करना माना जा रहा है। नए मंत्रियों को अब 10 महीने मिलेंगे अपनी छवि चमकाने और सरकारी योजनाओं के नाम पर पार्टी का संदेश पहुंचाने के लिए।‌ वहीं 100 से अधिक राज्य/दर्जा मंत्री भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा नियुक्त किए गये है ताकि भाजपा का प्रचार-प्रसार में आने वाले व्यय को सरकारी खर्चे से पूरा किया जा सके।

केंद्र में मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में शुरू हुए कार्यक्रमों की कमान सीधे मंत्रियों और विधायकों के हाथ में है। आरोप है कि सरकारी वाहनों, सरकारी अधिकारियों और सरकारी खर्च पर होने वाली इन बैठकों का मकसद जनता तक योजना पहुंचाना कम, भाजपा कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाना ज्यादा है। राज्य पहले से कर्ज के बोझ तले दबा है, बावजूद इसके सरकारी संसाधन पार्टी प्रचार में झोंके जा रहे हैं।
विगत दिवस सबसे साफ तस्वीर कपकोट विधानसभा में दिखी। कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैडा वहां भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ नजर आए, लेकिन आम जनता नदारद रही। ऐसे आयोजन सवाल खड़े करते हैं कि क्या यह सरकारी कार्यक्रम है या पार्टी की बंद कमरे की मीटिंग। वैसे भी भाजपा हाईकमान ने साफ कर दिया है कि 2027 का चुनाव धामी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा।

खर्च जनता का, फायदा पार्टी का

आलोचकों का कहना है कि चुनाव से ठीक पहले मंत्रियों और विधायकों का यह सक्रिय दौरा महज संयोग नहीं है। कैबिनेट विस्तार भी इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि राज्य मंत्री सरकारी संसाधनों के सहारे भाजपा का प्रचार तंत्र मजबूत करें। सरकारी धन से पार्टी का मिशन 2027 चलाना नैतिक और वित्तीय दोनों स्तर पर सवालों के घेरे में है। अब देखना यह है कि चुनाव आयोग और जनता इन आयोजनों को सरकारी योजना का प्रचार मानती है या भाजपा के चुनावी अभियान का हिस्सा।