Home उत्तराखंड ज्ञान उम्र का मोहताज नहीं, खतड़ुवा पर्व देता है यही सीख

ज्ञान उम्र का मोहताज नहीं, खतड़ुवा पर्व देता है यही सीख

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ज्ञान, उम्र और अनुभव – खतड़ुवा पर्व से एक सीख

पहाड़ में कहावत है – “उम्र बड़ी कि अक्ल बड़ी”। अक्सर कुछ लोग समझते हैं कि बड़ी उम्र, बड़ा पद या बड़ी डिग्री ही ज्ञान की गारंटी है, पर पहाड़ का लोकजीवन इससे उलट कहता है। यहां एक और कहावत प्रचलित है – “पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं” और “अक्ल बड़ी कि भैंस”। यानी ज्ञान का पैमाना साल नहीं, समझ है। कोई छोटी उम्र में ही वह परिपक्वता पा लेता है जो 80-90 साल के बुजुर्ग को भी नसीब नहीं होती, और कोई शासन-प्रशासन में ऊंचे पद पर बैठकर भी “छोटा मुंह बड़ी बात” करता रह जाता है। ऐसे लोगों के लिए पहाड़ में कहा जाता है – पढ़ा-लिखा तो है पर “ढाक के तीन पात” ही रहा। उनका ज्ञान समाज में सम्मान नहीं, बल्कि हंसी का पात्र बनाता है, क्योंकि “बूढ़ा तोता राम-राम नहीं सीखता” – अगर समय पर अनुभव से नहीं सीखा तो उम्र सिर्फ गिनती बनकर रह जाती है। इसी बात को समझाता है कुमाऊं का प्रसिद्ध लोकपर्व खतड़ुवा / खतड़वा, जो इस बार 17 सितंबर, कन्या संक्रांति को मनाया जा रहा है।

क्या है खतड़ुवा?

खतड़ुवा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि ऋतु-परिवर्तन, पशुधन संरक्षण और सत्य की जीत का प्रतीक है। भादो खत्म, अश्विन शुरू – बरसात विदा लेती है और पहाड़ में जाड़ा दस्तक देता है। पुराने समय में इसी दिन रजाई-गद्दे, जिन्हें स्थानीय बोली में ‘खातड़’ कहते हैं, को धूप दिखाई जाती थी, गोठ (गौशाला) की सफाई होती थी, पशुओं को नहला-धुलाकर उनकी सलामती की कामना की जाती थी। शाम को गांव के बच्चे लकड़ी और सूखी घास इकट्ठा कर बड़ा अलाव जलाते हैं और नारा लगाते हैं – “भैल्लो जी भैल्लो, गाय की जीत, खतड़ुवा की हार”। फूलों से बना खतड़ुवा का पुतला जलाया जाता है और उसकी राख पशुओं के माथे पर लगाई जाती है ताकि रोग-व्याधि दूर रहे। फिर पहाड़ी ककड़ी (काकड़) को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। लोकमान्यता इसे कुमाऊं के सेनापति गैड़ा सिंह द्वारा गढ़वाल के खतड़ सिंह पर जीत से भी जोड़ती है, पर इतिहासकार मानते हैं कि इसका मूल भाव “असत्य पर सत्य की जीत” और प्रकृति से जुड़ाव ही है।

निष्कर्ष यही है कि जैसे खतड़ुवा में पुरानी गंदगी, बीमारी और बुराई को आग में जलाकर नए मौसम का स्वागत किया जाता है, वैसे ही जीवन में भी जरूरी है कि हम उम्र और पद के अहंकार को जलाएं। कहावत सही कहती है – “सीखने की कोई उम्र नहीं होती और सिखाने का कोई पद नहीं होता।” खतड़ुवा यही सिखाता है, एक ओर गर्मी और बरसात के कीटाणुओं से राहत, दूसरी ओर अहंकार से मुक्ति।