कहते हैं अधिकार जन्म से मिलते हैं। अब लगता है अधिकार भी किश्तों में और कागजों के साथ आएंगे। मतदान, जिसे अब तक लोकतंत्र की बुनियाद कहा जाता था, अब एक नई प्रवेश परीक्षा बन गया है। नाम है “एस.आई. आर.”। फेल हुए तो कोई बात नहीं, री-एग्जाम का ऑप्शन खुला है। बस फॉर्म, फोटो, पुराना बिल और धैर्य साथ ले जाइए।
वैसे कहते हैं लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार वोट का अधिकार है। अब इसमें एक छोटा सा फेरबदल हो गया है। वोट का अधिकार तो आपका है, बस पहले एस.आई. आर. नाम की बोर्ड परीक्षा पास करनी होगी, यानि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। इसका उद्देश्य फर्जी नाम हटाना और असली नाम जोड़ना है। सिलेबस लंबा है : आधार, पैन, राशन कार्ड, गैस केवाईसी, जन्म प्रमाणपत्र, पुरानी वोटर लिस्ट, नये पते का सबूत, 10 साल पुराना बिजली का बिल इत्यादि। पासिंग मार्क्स 100 प्रतिशत डाक्यूमेंट सही। एक ग़लती और आप पुनः परीक्षा में सम्मिलित।
कुमाऊं आयुक्त/सचिव मुख्यमंत्री दीपक रावत और नैनीताल विधायक सरिता आर्या जैसे नाम भी इस बार की सूची में “अनुत्तीर्ण” पाए गए। सूत्रों के अनुसार कारण दस्तावेज में मामूली गड़बड़ी थी। राहत की बात यह है कि सिस्टम ने उन्हें भी दोबारा मौका दिया है। यानी बड़े हों या आम, लाइन सबको लगानी है।
परीक्षा का सिलेबस पुराना, पेपर नया
पिछले 10 साल में आम आदमी पहले ही कई बार “परीक्षा” दे चुका है।
राशन कार्ड: ई-केवाईसी
गैस कनेक्शन: ई-केवाईसी
पैन कार्ड: लिंक कराओ
आधार कार्ड: हर 10 साल में अपडेट कराओ
जन धन: फॉर्म भरो, बैंक जाओ, फिर बैंक जाओ
अब नया चैप्टर जुड़ गया है। मतदान का अधिकार। उसके लिए भी कागज दुरुस्त करो, ताकि निकट भविष्य में आप “योग्य मतदाता” घोषित हो सको। कुछ लोग री-एग्जाम में बैठ रहे हैं। फाइलें चमका रहे हैं। कुछ ने हाथ खड़े कर दिए। कहा, “छोड़ो भाई, इतनी पढ़ाई के बाद पास भी हुए तो छुट्टी किस दिन मिलेगी।” नतीजा, खुद को ही मतदान से वंचित कर लिया।
संघ का पुराना मंत्र
स्थानीय चर्चाओं में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक नियम खूब गूंज रहा है: “व्यक्ति को खाली मत बैठने दो, किसी न किसी काम में उलझाए रखो।” पहले लाइन राशन की थी, फिर बैंक की, फिर आधार की। अब लाइन लोकतंत्र की है। खाली समय बचे ही नहीं, सवाल भी न उठें। अधिकारी कहते हैं यह प्रक्रिया पारदर्शिता के लिए है। नागरिक कहते हैं पारदर्शिता तो है, बस दिखाई देने के लिए हमें पहले कई खिड़कियां पार करनी पड़ती हैं।
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि एक समय था जब वोट मांगने वाले घर आते थे। अब घर से निकलकर हमें वोट के लायक बनना पड़ रहा है। अधिकार वही है, रास्ता लंबा हो गया है। फिलहाल हल्द्वानी में चर्चाएं दो हैं। पहली, “इस बार कौन पास हुआ”। दूसरी, “अगली बार कौन सा दस्तावेज मांगा जाएगा”, यानि कौन से दस्तावेज में हमारा नाम, पता, जन्मतिथि इत्यादि गलत हो गया।
तैयारी शुरू कर दीजिए। कलम, कागज और धैर्य। क्योंकि लोकतंत्र में अब सिर्फ वोट नहीं, वेरिफिकेशन भी जरूरी है।































