देवभूमि की वादियों में आजकल दो तरह की इमारतें तेजी से बन रही हैं। एक वो जिनमें मजदूर दिनभर पसीना बहाकर दो जून की रोटी जुटाते हैं। दूसरी वो जिनकी नींव “सेवा भाव” से रखी जाती है, और छत “ऊंची पकड़” से लगती है।
हम बात कर रहे हैं उन सफेदपोश नौकरशाहों की, जो सुबह जनता को अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं और शाम को अपना वर्चस्व दिखाने ठेले वाले और श्रमिक पर निकल पड़ते हैं। इनका जीवन-दर्शन बहुत सरल है: “आप कतार में लगिए, हम कतार के आगे महल बनाएंगे।”
सूत्रों से पता चला है कि इन्हीं में से एक महोदय का भव्य और अलौकिक आवास भी निर्माणाधीन है। अलौकिक इसलिए, क्योंकि तनख्वाह लौकिक है, पर मकान अलौकिक। और लोक-लाज बचाने के लिए यह भवन भी संयोगवश परिजन के नाम पर ही बन रहा है। कानून की आंख में धूल और जनता की आंख में पानी, दोनों का इंतजाम साथ-साथ।
इनके दरबार में चाटुकारों की कमी नहीं। ये वही लोग हैं जिनकी पीठ आज थपथपाई जाती है और कल यही पीठ पर वार करेंगे। इनकी निष्ठा मौसम की तरह है। जहां लाभ की धूप, उधर ही छांव। आज “सर” कहकर सलाम, कल “साहब” कहकर खुलासा।
और अब खेल और दिलचस्प हो गया है।
कई सरकारी विभागों के छोटे-मोटे नौकरशाह भी अब खुद को इन बड़े नौकरशाहों के बराबर समझने लगे हैं। ताज्जुब की बात ये कि बड़े नौकरशाह इनका कुछ बिगाड़ भी नहीं पा रहे। कारण सबको पता है। इन छोटे नौकरशाहों को मालूम है कि बड़ों की ईमानदारी का तराजू कितना हल्का है। भले ही इन पर विभागीय जांच चल रही हो, पर डर किस बात का? जब बड़े ही काले कारनामों के कंधे दे रहे हों, तो छोटों की हिम्मत तो बढ़ेगी ही। नतीजा ये कि मां-बाप की मेहनत से सेवा में आए ये छोटे नौकरशाह भी अब बड़ों की बराबरी में खड़े हो गए हैं। “ऊपर” से आशीर्वाद है, तो “नीचे” से निडरता अपने आप आ जाती है।
कहते हैं “चलती का नाम गाड़ी” है। पर इतिहास गवाह है कि हर गाड़ी की एक टर्मिनल स्टेशन होती है। और वहां एक कहावत स्वागत में खड़ी मिलती है — “जैसी करनी वैसी भरनी”।
उत्तराखंड की जनता सब देख रही है। पहाड़ की हवा में आवाज बहुत दूर तक जाती है। आज जो दीवारें ईंट-सीमेंट से ऊंची हो रही हैं, कल सवालों से और ऊंची हो जाएंगी।
फिलहाल “सेवा” जारी है। बस सेवा देने वाले की और सेवा लेने वाले की परिभाषा बदल गई है।
पहाड़ का एक नियम है – यहां कुछ भी ज्यादा दिन तक नहीं छुपता । हवा अपना काम कर ही देती है। फिलहाल “वर्चस्व” के नशे में चूर ये महानुभाव निश्चिंत हैं। पर उत्तराखंड की जनता और समय दोनों की स्मृति बहुत तेज है। जल्द ही सही और उचित समय पर ऐसे महानुभाव नौकरशाहों का खुलासा भी होगा और तब वही चाटुकार जो आज माला पहना रहे हैं, कल हिसाब की फाइल लेकर सबसे आगे खड़े मिलेंगे।
क्योंकि अंत में जीत हमेशा “जैसी करनी वैसी भरनी” की ही होती है।































