(आलेख : बादल सरोज)
पता नहीं, कुनबे ने मीर तकी मीर साहब को कितना पढ़ा है। पढ़ा होगा तो उनका अशआर “उल्टी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया” जरूर याद आ रहा होगा। जेन-जी के भूचाल से सुन्न और सट्ट होने की अवस्था, सन्निपात की हालत से गुजरते हुए अब संतुलन गंवाने तक आन पहुंची है। उससे उबरने के लिए जितनी-जितनी चालें चलते हैं, उलझन उतनी उतनी ही बढ़ती जाती है। कल्चरल शॉक लगने का दांव उलटा पड़ता दिखाई दे रहा है और अब उसे लेकर जिनको सफाई देने के लिए लगाया है, वे मुश्किल बढ़ाते हुए और ज्यादा फंसा रहे हैं। नतीजा यह है कि लालकिले की तस्वीरों से लेकर अब तक आई सबकी, सभी सार्वजनिक तस्वीरों में चेहरे उदास हैं, पेशानियों पर बल हैं, चाल-ढाल में थकान हैं। शह ऐसी लगी है कि शाह से लेकर वजीर तक हलाकान है, बिसात पर बिखरे प्यादे भी परेशान हैं। कुछ पसंदीदा मोहरे तो उल्टी चाल चलने के संकेत तक देने लगे हैं। जो जवाब देने में आगे-आगे रहते थे, वे ही सवाल पूछने लगे हैं।

युवतर भारत के झन्नाटेदार तूफ़ान से ढीले-पोले हुए तम्बू को उखड़ने से बचाने के लिए पहली शुरुआत नफरती जहर की ज्यादा तेज और नयी खुराक का प्रबंध करने से की गयी। जिसे आई टी सैल कहते हैं, उसके अब तक के हुक्कामों, परखे और आजमाए हुए जहरखुरानों को ठीक नागपंचमी के दिन धकेल बाहर किया गया। उनकी जगह छांट-छांट कर , ढूंढ-तलाश कर नए विषधर लाये गए। ये इतने ज्यादा असभ्य, अभद्र और अश्लीलता की हद तक लिखने-बोलने वाले हैं कि नई नियुक्ति से पहले ही हरेक को अब तक के अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स को मिटाना और छुपाना पड़ा। इस तरह व्हाट्सअप्प यूनिवर्सिटी की असलियत समझ चुकी पीढ़ी के लिए इन्स्टाग्राम पर पर सुरंगें बिछाने को अहमियत देने की योजना पर अमल शुरू किया गया। सुनते हैं कि स्वयं मोदी जी ने इस नयी आमद के साथ प्रधानमंत्री आवास में चाय पर चर्चा की और उनका बौद्धिक लिया ।
इस नई तैनाती के बाद उठाया वह ब्रह्मास्त्र, जिसकी तैयारी जंतर मंतर के जमाव के दौरान ही आरम्भ की जा चुकी थी। युवाओं की एकता को आरक्षण के नाम पर बाँटने और भटकाने के लिए अस्सी के दशक से हर मुश्किल मौके पर आजमाया जाता रहा हथियार धो-पोंछकर काम पर लगाया गया।
कहानी कुछ यूं बनी कि सीजेपी की नक़ल करते हुए छत्तीसगढ़ के भाजपा कुनबे के हर्ष दुबे के नाम से “रिजर्वेशन हटाओ आन्दोलन” नाम से सोशल मीडिया और इन्स्टाग्राम पर पेज बनवाकर जंतर मंतर आन्दोलन के दौरान ही इस युद्ध का शंख फूंक दिया गया था। सबने मिलकर इसके फ़ॉलोअर्स की संख्या कुछ ही सप्ताहों में 50 लाख पार करवा दी – मगर 21 अगस्त को जंतर मंतर पर इकट्ठा होने के आव्हान के टांय टांय फुस्स हो जाने और 23 अगस्त को दर्जन पर लोगों के भी न पहुँचने के बाद तुरंत भाजपा आपदा प्रबंधन में जुट गयी। आन्दोलन के दुबे और पाठक को, जिनका इस कथित आन्दोलन की मांगों की मंजूरी-नामंजूरी से लेना एक, न देना दो था, उनको उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से मिलवाकर संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में मुंह दिखाने लायक फार्मूला निकालने की कोशिश की गयी।
जनसमर्थन न मिलने पर कुनबे में ही रार मच गयी। सवर्णों के वर्चस्व की बहाली के घोषित लक्ष्य के लिए ‘वीर तुम बढे चलो’ गाते हुए निकले स्वयम्भू शूरों के बीच ही ठाकुर और ब्राहमणों के नाम पर जूतों में दाल बंटने लगी। बताते हैं कि अब कमान उसे सौंप दी गयी है, जो कुनबे के सगे और कई बार झूठ फैलाते पकड़े गए वेबपोर्टल ऑपइंडिया से प्रशिक्षित है और सिद्ध दुर्भाषा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े समुदायों के खिलाफ उकसावेपूर्ण गालीगलौज की मुहिम तेज कर ध्रुवीकरण की साजिश का ज्यादा उग्र चरण शुरू किया जा चुका है। बात यूजीसी द्वारा अद्यतन किये गए यूजीसी इक्विटी विनियम, 2026 ही नहीं, अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण क़ानून के खात्मे की मांग तक जा चुकी है। तय है कि आगे आने वाले दिनों में इसे और तेज किया जाएगा।
हाल में मनुस्मृति को लेकर शुरू हुई चर्चा में योगी आदित्यनाथ सहित संघ और भाजपा नेताओं का खुल्लमखुल्ला इस कुख्यात ग्रन्थ – जिसे स्वयं को सनातनी बताने वाले महात्मा गांधी तक ने भारत के माथे पर कलंक बताया था – के समर्थन में उतर जाना इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए। आर एस एस इस देश का एकमात्र संगठन और भारतीय जनता पार्टी एकमात्र पार्टी है, जो भारत को मनुस्मृति के आधार पर संचालित किये जाने में विश्वास करती है। संघ ने यह बात कभी नहीं छुपाई, अपने आधिकारिक प्रकाशनों में से कभी नहीं हटाई। इसके मौजूदा सरसंघचालक सहित प्रत्येक संघ प्रमुख ने कभी न कभी इसे दोहराया। तीखी प्रतिक्रिया होने पर उसे लपेटने की कोशिश जरूर की, मगर नकारा कभी नहीं।
दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि यह मनुस्मृति थी, जो भारत की गुलामी का एक बड़ा कारण बनी थी। यही वजह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जितने भी राजनीतिक और सामाजिक सुधार के आंदोलन चले, उनमें से ज्यादातर ने इस मनुस्मृति को अभिशाप माना और इसके दुष्प्रभावों से समाज को मुक्त कराने के अभियान छेड़े। मगर कुछ लोग थे, जो उस दौर में अंग्रेजों की गुलामी को भी अभिशाप नहीं मानते थे। जो तब भी मनुस्मृति को ही भारत पर राज करने का एकमात्र समुचित और व्यवस्थित प्रावधान मानते थे। यही कुछ लोग हैं, जो बाद में आरएसएस के रूप में संगठित हुए और जिन्होंने आजादी के महासंग्राम का विरोध किया।
यह आर एस एस था, जिसने जब आजादी मिल गयी, तब घोषित रूप से कहा कि अब इस देश को किसी नए संविधान की आवश्यकता नहीं है। कहा कि आजादी के बाद भारत का संचालन इस पुरानी किताब मनुस्मृति के आधार पर किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद के भारत में यह शक्ति आम तौर से कमजोर और हाशिए पर ही रही। मगर हाल के कुछ दशकों में इन्होंने हर संभव-असंभव तिकड़म और देसी-विदेशी कारपोरेट के साथ गठबंधन करके राजनीतिक शक्ति हासिल कर ली और सत्ता में पहुंच गयी। सत्ता में आने के बाद इसने संविधान और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के किसी भी मौके को नहीं गवाया।
मनुस्मृति के बहुत से बुनियादी सिद्धांतों को धोखाधड़ी के साथ क्रियान्वित किया ; चाहे वह सरकारी क्षेत्र में आरक्षण को अप्रासंगिक बना कर व्यवहारतः लगभग समाप्त करने वाली बात हो, स्कूल बंदी और सरकारी शिक्षा के तंत्र को ध्वस्त करने का काम हो, इस तरह दलित-आदिवासी और शोषित तबकों को शिक्षा से बाहर करने वाली बात हो, चाहे वह मजदूरों को श्रम कानूनों और किसानों को खेती-किसानी से वंचित करने वाली बात हो या फिर नोटबंदी हो या जीएसटी ; हर उपाय अपने अंतिम निष्कर्ष में उच्च संपत्तिशाली वर्गों को बेलगाम और निरंकुश शक्ति और सम्पदा देने वाला तो था ही, लेकिन इसी के साथ समाज के एक बड़े हिस्से को मनु के सूत्रों के अनुरूप ढालने का भी था। यह हिन्दुत्व की पोलिटिकल इकॉनोमी है ; आधुनिक कार्पोरेटी अर्थशास्त्र का अपनी सुविधा के लिए खुल्लमखुल्ला मनु के बघनखे के लिए इस्तेमाल किया जाना है।
महिलाओं के लिए तो मनुस्मृति और भी भयानक है : यह पूरे विस्तार के साथ महिलाओं की स्थिति के बारे में नियम निर्धारित करती है। इसके अध्याय नौ में 300 से ज्यादा श्लोक हैं, जिनमें महिलाओं के साथ किए जाने वाले बर्ताव के बारे में पूरे विस्तार से प्रावधान किए गए हैं।
इसका एक श्लोक कहता है कि “सभी जातियों में इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए कि पत्नियों और महिलाओं पर चौकसी रखी जाये।” एक और श्लोक में कहा गया है कि “ईश्वर ने महिला को बनाते वक्त उसमें जिस तरह की मनोवृत्ति जोड़ी थी, उस को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि पुरुष पूरे ध्यान से उन पर निगरानी रखें।”
एक कुख्यात श्लोक महिलाओं के बारे में यह प्रावधान करता है कि “बचपन में उसे अपनी पिता के संरक्षण में, युवा काल में पति के संरक्षण में और बुढ़ापे में अपने पुत्रगणों के संरक्षण में रहना चाहिए। एक औरत कभी भी स्वाधीन रहने के काबिल नहीं होती।” बात स्त्री को पिता, पति और पुत्र के नियंत्रण तक ही सीमित नहीं रहती, उससे भी आगे जाती है और प्रावधान करती है कि : “परिवार में पुरुषों को चाहिए कि वे औरत को दिन-रात अपना गुलाम बना कर रखें और जब भी वे इंद्रिय भोग का सुख लेना चाहें लें और स्त्री को हमेशा अपने वश में रखें।”
इधर आरक्षण के विरोध के नाम पर ‘सबको शिक्षा सबको काम’ के वास्तविक मुद्दे पर जाग्रत और एकजुट हो रहे युवाओं के बीच में टकराव पैदा करना और उधर भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और सनातन की परम्परा का हिस्सा बताना एक ही खोटे सिक्के के दो पहलू हैं। मुद्दे की बात यह है कि भले सारा जोर लगाने के बाद भी कुनबा 21 तथा 23 अगस्त को भीड़ नहीं जुटा पाया, मगर इसे साजिश की विफलता समझना ठीक नहीं होगा। संघ और भाजपा अच्छी तरह से जानती है कि इस मुद्दे पर आग भड़काकर ही वह उस उभार को भ्रमित और कमजोर कर सकती है, जिसने उसकी सारी हवा निकाली हुई है। इस बात की ताईद वन्दे मातरम के छहों अंतरों को गाने के उसके शिगूफे के उठते ही खत्म हो जाने की दशा ने भी कर दी है। ले-देकर अब उसके पास अब यही एक विभाजनकारी सहारा बचा है।
फासीवाद की खासियत है कि वह सबक लेकर सुधरने में नहीं, उग्र से उग्रतर होने में यकीन रखता है। देश भर में बड़ी लामबंदी न कर पाने की कमी पूरी करने के लिए अब उसने स्थानीय पैमाने पर हरकतों का सिलसिला शुरू कर दिया है। आरक्षण के पक्ष में बोलने पर संघी गुंडावाहिनी द्वारा दिल्ली में डी वाय एफ आई के प्रदेश कोषाध्यक्ष राहुल किराड़ पर हमला करने के इरादे से उनके घर को घेरकर इसका संकेत दे दिया है। उनको लगता है कि वे इस तरह डरा लेंगे। मगर जेन जी के बाद अब जेन अल्फा भी जिस तेवर के साथ मैदान में उतरी है, उससे साफ़ हो जाता है कि माहौल बदल रहा है और इस बदलाव को शिगूफों से नहीं रोका जा सकेगा।
कुल मिलाकर हालात यह हैं कि पूरा कुनबा सरे बाजार निर्वस्त्र खड़ा है, जितना खुद को ढांपने के जतन कर रहा है, उतना ही और उघड़ रहा है। जुलाई से देश की युवा पीढ़ी, उसके बाद 10 अगस्त और उसके अभियान में उसके अभिभावकों – किसान और मजदूरों – ने एक हजार से अधिक जगहों पर दस लाख से अधिक संख्या में गिरफ्तारियां देकर इसी प्रक्रिया को गति भी दी है, दिशा भी दी है।
इतिहास में ऐसे समय आते हैं, जब देश और जनता को, वर्तमान और भविष्य को बचाने के लिए बोलना जरूरी होता है। मगर ऐसे भी समय आते हैं, जब सिर्फ बोलना या असहमति में हाथ उठाना काफी नहीं होता – सड़कों पर उतरना भी होता है। यह समय ऐसा ही समय है।
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)
































