शहरी आरोग्य मंदिरों के नर्सिंग कर्मचारियों-चिकित्सकों को मिला कुछ बकाया वेतन, बाकी के लिए अब सरकार-निदेशालय से लड़ाई, नगर निगम हल्द्वानी बनेगा आंदोलन का केंद्र
हल्द्वानी। हल्द्वानी के शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में कार्यरत नर्सिंग कर्मचारियों और चिकित्सकों के महीनों से लंबित वेतन को लेकर किसान मंच उत्तराखण्ड द्वारा शुरू किए गए संघर्ष का असर अब दिखाई देने लगा है। लगातार आवाज उठाए जाने और प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप के बाद नर्सिंग कर्मचारियों के दो माह तथा चिकित्सकों के एक माह का वेतन उनके खातों में पहुंच गया है। हालांकि कर्मचारियों का अभी और वेतन बकाया है, जिसे लेकर किसान मंच ने साफ कर दिया है कि यह संघर्ष यहीं समाप्त नहीं होगा।
किसान मंच उत्तराखण्ड ने वेतन भुगतान की दिशा में हुई सकारात्मक पहल के लिए हल्द्वानी के मेयर गजराज बिष्ट और नगर आयुक्त हल्द्वानी का आभार जताया है। मंच का कहना है कि स्थानीय स्तर पर हुई पहल से कर्मचारियों को तत्काल कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन मूल समस्या का स्थायी समाधान अभी बाकी है।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि कर्मचारियों को उनका कुछ बकाया वेतन मिलने को किसान मंच अपने संघर्ष की पहली सफलता के रूप में देखता है, लेकिन जब तक नर्सिंग कर्मचारियों और चिकित्सकों का पूरा बकाया नहीं मिल जाता तथा भविष्य में नियमित और समयबद्ध वेतन की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन के अगले चरण में नगर निगम हल्द्वानी संघर्ष का केंद्र बनेगा। धरना नगर निगम परिसर में दिया जाएगा, लेकिन विरोध नगर निगम के मेयर या नगर आयुक्त का नहीं, बल्कि शहरी विकास निदेशालय और राज्य सरकार का होगा। किसान मंच का कहना है कि स्थानीय स्तर से जिस सीमा तक कर्मचारियों को राहत दिलाई जा सकती थी, उसके लिए पहल हुई है। अब शेष बकाया और व्यवस्था से जुड़े सवालों का जवाब शासन तथा संबंधित निदेशालय को देना होगा।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि यह केवल कुछ महीनों के वेतन का मामला नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े इन केंद्रों पर नर्सिंग कर्मचारी और चिकित्सक लगातार अपनी सेवाएं देते रहे, इसके बावजूद उन्हें समय पर वेतन क्यों नहीं मिला? यदि कर्मचारियों से नियमित काम लिया जा रहा है तो उनके वेतन और श्रम अधिकारों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार और शहरी विकास निदेशालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शहरी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में काम करने वाले कर्मचारियों की सेवा और वेतन भुगतान की अंतिम जिम्मेदारी किसकी है। ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती जिसमें कर्मचारी काम करता रहे और वेतन रुकने पर विभाग, निकाय तथा कंपनी एक-दूसरे की ओर जिम्मेदारी डालते रहें।
किसान मंच ने संबंधित कंपनी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए मांग की है कि कर्मचारियों को महीनों तक वेतन के लिए परेशान किए जाने के पूरे मामले की जांच हो। यह देखा जाए कि वेतन भुगतान में देरी क्यों हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार था और कर्मचारियों के श्रम अधिकारों का पालन हुआ या नहीं। यदि जांच में कंपनी दोषी पाई जाती है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करते हुए उसे उत्तराखण्ड में ब्लैक लिस्ट किया जाए।
मंच का कहना है कि कर्मचारियों को वेतन न मिलने से केवल उनकी नौकरी प्रभावित नहीं होती, बल्कि उनके परिवार का पूरा आर्थिक ढांचा प्रभावित होता है। घर का किराया, बच्चों की फीस, राशन, इलाज और अन्य दैनिक खर्च वेतन पर निर्भर होते हैं। ऐसे में महीनों तक वेतन रोकना कर्मचारियों को आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर परेशान करने जैसा है।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने श्रम विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जब कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा था तो उनके श्रम अधिकारों की रक्षा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी। इसी मुद्दे को लेकर आगामी आंदोलन में श्रम आयुक्त का पुतला बनाकर विरोध दर्ज कराया जाएगा।
उन्होंने कहा कि किसान मंच का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आंदोलन करना नहीं, बल्कि कर्मचारियों को उनका पूरा अधिकार दिलाना और भविष्य के लिए जवाबदेह व्यवस्था बनवाना है। जिन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने कर्मचारियों के हित में सकारात्मक पहल की है, उनका संगठन आभार व्यक्त करता है, लेकिन जिन स्तरों पर अभी निर्णय और भुगतान लंबित है, वहां जवाबदेही की मांग भी उतनी ही मजबूती से उठाई जाएगी।
अब किसान मंच उत्तराखण्ड शेष बकाया वेतन, नियमित मासिक भुगतान, कर्मचारियों की सेवा स्थिति स्पष्ट करने, श्रम अधिकारों की रक्षा तथा संबंधित कंपनी की जवाबदेही तय करने को लेकर आंदोलन के अगले चरण की तैयारी कर रहा है।
किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने कहा, “नर्सिंग कर्मचारियों के दो माह और चिकित्सकों के एक माह का वेतन मिलना संघर्ष का असर है, लेकिन अभी उनका और वेतन बाकी है। इसलिए लड़ाई खत्म नहीं हुई। नगर निगम हल्द्वानी हमारा आंदोलन स्थल होगा, लेकिन विरोध शहरी विकास निदेशालय और राज्य सरकार की व्यवस्था के खिलाफ होगा। श्रम आयुक्त की भूमिका को लेकर भी विरोध दर्ज कराया जाएगा। कर्मचारियों को पूरा हक मिलने तक हम पीछे नहीं हटेंगे।”
किसान मंच उत्तराखण्ड ने कहा है कि आंदोलन की तारीख, स्वरूप और आगे की पूरी रणनीति जल्द सार्वजनिक की जाएगी।































