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कॉलेज इलेक्शन: जीत के बाद क्या?

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कहते हैं कि कॉलेज की राजनीति, बड़ी राजनीति में आने का पहला चरण है। लेकिन इस प्रथम चरण के बाद क्या होता है, यह सवाल ज्यादा अहम है। हो-हल्ला, हंगामा, नारेबाजी और कुछ लोगों पर मुकदमों के बाद अब चुनावी शोर थम गया है। जीत-हार के बाद हर कोई फिर से एक ही क्लास में, एक ही कैंपस में साथ तो नजर आएगा, लेकिन वो विश्वास और वो दोस्ती जो एडमिशन लेते समय थी, वह कहीं न कहीं राजनीतिक दलों की विचारधारा के कारण दूरियों में बदल जाती है। हर साल की तरह चुनाव संपन्न हो गए। अब असली कहानी शुरू होगी। कोई ठेकेदार बनेगा, कोई वसूली मास्टर, कोई प्राइवेट नौकरी की तलाश में भटकेगा तो कोई कुछ और। जैसा पहले होता आया है, वैसा ही आगे भी होगा। फर्क सिर्फ इतना है कि जीतने-हारने वाले छात्र अब छात्र नहीं, बल्कि कांग्रेस के, भाजपा के या अन्य दलों के हो जाएंगे। सवाल यह है कि क्या कॉलेज के विकास और बेहतर शिक्षण व्यवस्था पर कोई काम होगा? जवाब है – शायद नहीं। क्योंकि अब कॉलेज के छात्र एकमत छात्र नहीं रहे, बल्कि वे राजनीतिक पार्टी की विचारधारा से बंध गए हैं। जिसका सीधा फायदा उनके आका, यानी जो पहले से भाजपा-कांग्रेस जैसे दलों में बैठे हैं, उन्हें मिलेगा। ये छात्र नेता उन्हीं के इर्द-गिर्द, उन्हीं के इशारों पर काम करते दिखेंगे। जब तक कॉलेजों के चुनाव एबीवीपी और एनएसयूआई यानी भाजपा और कांग्रेस में बंटकर होते रहेंगे, तब तक किसी भी कॉलेज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। आज भी कई कॉलेजों में प्रोफेसर नहीं हैं, लैब नहीं हैं, लाइब्रेरी में किताबें नहीं हैं, वो सुविधाएं नहीं हैं जो इन नौनिहालों को बेहतर कल दे सकें। इन मुद्दों पर कोई बात नहीं करता। बेशक, जो जीते हैं या जिनकी ऊपर तक पकड़ है, उनमें से कुछ ठेकेदार बन जाएंगे, कुछ नेताओं के लिए पन्ना प्रमुख, फलाना प्रमुख, संगठन पदाधिकारी बनकर ही सिमट कर रह जाएंगे। समय कब किस ओर करवट बदलेगा और किसका भाग्य साथ देगा, कोई नहीं जानता। लेकिन इतना तय है कि जब तक छात्रसंघ चुनाव छात्र हितों के बजाय दल हितों पर लड़े जाएंगे, तब तक कैंपस में विकास नहीं, सिर्फ ठेकेदारी और राजनीति की नई पौध ही पनपती रहेगी।