Home उत्तराखंड तो क्या राष्ट्रीय दलों के बीच उत्तराखंड में परचम लहराएगी यूकेडी

तो क्या राष्ट्रीय दलों के बीच उत्तराखंड में परचम लहराएगी यूकेडी

781

2027 का रण होगा रोचक

उत्तराखंड की सियासत में कभी ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ कही जाने वाली उत्तराखंड क्रांति दल आज दो राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरी ताकत बनकर उभरी है। जिस दल ने राज्य को बनाने से लेकर बनने तक लाठियां खाईं, आंदोलन में अपनी जान दी, उसी दल को 26 साल तक सत्ता का वनवास झेलना पड़ा। लेकिन 2027 आते-आते तस्वीर बदलती दिख रही है। कहावत है – बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। भाजपा-कांग्रेस ने बारी-बारी से सत्ता का स्वाद तो चखा, पर पहाड़ के जख्मों पर मरहम नहीं लगाया।

पहाड़ में फिर जगी यूकेडी की अलख

बीते कुछ महीनों में यूकेडी ने जन मुद्दों को हथियार बनाकर घर-घर दस्तक दी है। नतीजा – पहाड़ की 15 से 20 सीटों पर यूकेडी अब मजबूत दावेदार दिख रही है। जहां कभी प्रत्याशी ढूंढना मुश्किल था, आज वहां टिकट के लिए घमासान मचा है। यानी अब यूकेडी के भी दिन बहुरने लगे हैं। यूकेडी के झोली में इस बार असली मुद्दे हैं – स्थाई राजधानी गैरसैंण, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भ्रष्टाचार, यूजीसी। 26 साल में भाजपा-कांग्रेस मिलकर भी गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित नहीं कर पाई, इस बात को पहाड़ का बच्चा-बच्चा समझने लगा है।

भाजपा की उल्टी गिनती शुरू?

भीतरखाने से आ रही खबरों की मानें तो यूजीसी बिल और सरकारी संपत्तियों की खुर्द-बुर्द ने भाजपा की जड़ें हिला दी हैं। लोगों में चर्चा है कि इस बार भाजपा 3-4 सीटों पर भी सिमट सकती है। धामी सरकार में जिस तरह ‘जितना बचा है बेच दो’ वाली नीति दिख रही है, उससे साफ है कि भाजपा को भी भनक लग गई है कि 2027 की डगर आसान नहीं। पहाड़ में स्कूल-अस्पतालों ने तो दम तोड़ा ही, सक्षम लोगों को भी सुविधाओं के अभाव में करोड़ों की पुश्तैनी संपत्ति छोड़कर पलायन करना पड़ा। उधर कांग्रेस का हाल भी बेहाल है। चुनाव आते ही उसे जन मुद्दे याद आते हैं। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस के कई दिग्गज नेता कभी भी पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम सकते हैं और यही खेल उल्टा भी हो सकता है। यानी दोनों राष्ट्रीय दलों में भगदड़ मचने के आसार नजर आ रहे है।

2027 में खेला होबे?

जमीन पर माहौल कह रहा है – जनता जाग गई तो यूकेडी सत्ता के सिंहासन तक भी पहुंच सकती है। लेकिन यूकेडी और कांग्रेस को एक मांग मजबूती से उठानी होगी – मतदान वाले दिन ही EVM से रिजल्ट घोषित हो। जब प्राइवेट कंपनी में 24 घंटे शिफ्ट वाइज काम हो सकता है, तो लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व में क्यों नहीं? वरना जो खेल पश्चिम बंगाल में हुआ, वही खेल उत्तराखंड में भी दोहराया जा सकता है। कुल मिलाकर, 2027 का चुनाव ‘कांटे की टक्कर’ वाला होगा और इस बार पहाड़ अपने असली बेटे यूकेडी पर दांव खेलने को तैयार बैठा दिख रहा है।

2027 में यूजीसी ही बनेगा असल मुद्दा?

2027 विधानसभा चुनाव से पहले यूजीसी सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है। जिसे भाजपा अपना मास्टर स्ट्रोक बता रही है, वही कानून अब उसके सवर्ण कोर वोटर में नाराजगी का कारण बन गया है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के सवर्ण कार्यकर्ताओं में इस कानून को लेकर भारी रोष है। कई कार्यकर्ता इसे काला कानून बता रहे हैं और पार्टी छोड़ने तक की चर्चा है। जमीन पर यह कानून सवर्ण समाज को एकजुट कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आचार संहिता लगते ही बड़े पैमाने पर दल-बदल देखने को मिल सकता है। अब देखना होगा कि सवर्णों की ये नाराजगी चुनाव में किस करवट बैठती है।