एक उपलब्धि के साथ ही प्रगति की राह पर हमारी सतर्कता
शशि कुड़ियाल “चन्द्रभा”
देहरादून। जब घर का मुख्य द्वार खुला रखना पड़े तो अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि यह खुलापन अपने साथ केवल शीतल बयार नही बल्कि अवांछित अंधड़, अशुद्धियों और असामाजिक तत्वों को भी आमंत्रित करता है और यह सतर्कता रखना केवल घर के मुखिया का ही नहीं अपितु घर के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है।
दिल्ली से देहरादून की दूरी अब केवल ढाई घंटे की रह जाएगी। यह सरकार की तरफ से हमारे लिए बहुत बड़ी सौगात है और वास्तव में बेहद सुखद है। व्यापार बढ़ेगा, पर्यटन को नई दिशा मिलेगी और आपातकालीन परिस्थितियों में दिल्ली तक पहुंच सुगम होगी साथ ही रोज़गार के नए अवसर बनेंगे, इसके लिए हम सब को बहुत बधाई और सरकार को साधुवाद। लेकिन प्रसन्नता के साथ-साथ अब हमें अधिक सतर्क और जिम्मेदार भी होना जरूरी है क्योंकि हर सुविधा अपने साथ कुछ समस्याएं और चुनौती भी लेकर आती है l जब भी किसी शांत क्षेत्र की ‘एक्सेसिबिलिटी’ बढ़ती है, तो उसके साथ सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी अनिवार्य रूप से आती हैं। अपराध दर और सुरक्षा की दृष्टिकोण से इस डर और चिंता के पीछे कुछ ठोस कारण हैं-
सुरक्षासंबंधी प्रमुख चुनौति
‘फ्लोटिंग पॉपुलेशन’ का बढ़ना- यात्रा समय कम होने से शहर में ऐसे लोगों की आवाजाही बढ़ेगी जिनका स्थानीय स्तर पर कोई रिकॉर्ड नहीं होगा। इससे बाहरी तत्वों की पहचान करना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
तेजी से निकल भागने की सुविधा
ढाई घंटे का रास्ता अपराधियों के लिए “hit and run” (अपराध करके तुरंत राज्य की सीमा से बाहर निकल जाना) को आसान बना देता है। दिल्ली या पश्चिमी यूपी के अपराधी अपराध कर कुछ ही घंटों में सुरक्षित ठिकानों पर पहुंच सकते हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव और छिपने के स्थान
बढ़ते शहरीकरण के कारण देहरादून के बाहरी इलाकों में नई कॉलोनियां बस रही हैं। इन भीड़भाड़ वाले इलाकों में असामाजिक तत्वों के लिए किराएदार बनकर पहचान छिपाना आसान हो जाता है।
ट्रैफिक व्यवस्था की चुनौती
देहरादून और ऋषिकेश में ट्रैफिक की वर्तमान में जो स्थिति है वह किसी से छुपी हुई नही है और आने वाले समय में क्या होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। बाहर से आने में जितना समय लगता है उससे कहीं अधिक घंटे शहर के अंदर जाम में फंसकर अपने गंतव्य पर पहुंचने में लग जाते हैं। इसे व्यवस्थित रखना आने वाले समय में प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगा।
समाधान की ओर बढ़ते कदम
विकास का स्वागत है लेकिन साथ साथ सुरक्षित रहने की भी दरकार है। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन और समाज दोनों को सतर्क होना होगा।
- डिजिटलनिगरानी : एक्सप्रेस-वे के प्रवेश और निकास द्वारों पर High-Tech CCTV और ANPR (Automatic Number Plate Recognition) कैमरों का होना अनिवार्य है ताकि हर वाहन का रिकॉर्ड रहे।
- सख्त सत्यापन : होटल, होमस्टे और किराएदारों के लिए पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और अनिवार्य बनाना होगा।
- सामुदायिक सतर्कता: मोहल्ला समितियों को अधिक सक्रिय होना पड़ेगा ताकि वे अपने क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रख सकें।
- सजग नागरिक: हम अपने आसपास होने वाली संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखें। किराएदारों और बाहरी लोगों का पुलिस वेरिफिकेशन पूरी ईमानदारी से करवाएं।
- जिम्मेदार पर्यटन: हम आने वाले अतिथियों का स्वागत करें, लेकिन शहर की मर्यादा और शांति बनाए रखने की अपील के साथ।
- असामाजिक तत्व : भीतरी और बाहरी अपराधियों के लिए कड़ी और त्वरित सज़ा का प्रावधान होना चाहिए ताकि अपराधियों के लिए हमारा उत्तराखंड एक सॉफ्ट टारगेट न बन सकें।
आइए, हम आधुनिकता और विकास को अपनाएं, लेकिन अपनी जड़ों और अपने घर की सुरक्षा के प्रति भी उतने ही सजग रहें। विकास तभी सार्थक है जब वह सुरक्षित हो और इसे सुरक्षित रखना केवल प्रशासन का नही बल्कि हम सब का उत्तरदायित्व है।



























