पेपर लीक हुआ, तो सिर्फ एक प्रश्नपत्र नहीं गया।
उसके साथ एक बच्चे की रातों की नींद गई, माँ-बाप की जमा पूंजी गई, और किसी किसान के खेत का एक-एक बीघा गया।
नीट की बात है। देश भर के लगभग 22 लाख विद्यार्थी इस परीक्षा में बैठे। कोई कोटा से आया, कोई दो कमरे के मकान से, कोई कर्ज लेकर। कोचिंग की फीस, किताबें, शहर का किराया, माँ का त्याग और पिता की चुप मेहनत, ये सब मिलकर एक फॉर्म भरता है और जब फॉर्म भरते-भरते परीक्षा का पेपर ही बाजार में बिक जाए, तो सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं रहता, भरोसे का हो जाता है।
यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी पेपर लीक हुए, जांच कमेटियां बनीं, रिपोर्टें दबीं, और माफिया का हौसला हर बार थोड़ा और बुलंद हुआ। नतीजा वही: मेहनत हार गई, जुगाड़ जीत गया।
इस बार पानी सिर के ऊपर चला गया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र उतरे। मांग एक ही थी: जवाबदेही। शिक्षा मंत्री से इस्तीफे की मांग तक बात पहुंची। बीच में भूख हड़ताल की खबरें भी आईं। फिर 20-21 जुलाई को जंतर-मंतर पर पुलिस बल तैनात हुआ। वीडियो और तस्वीरों में जो दिखा, उसने पूरे देश को झकझोरा। लाठियां चलीं, युवा लहूलुहान हुए, पर धरना नहीं टूटा।

यहां रुककर हमें खुद से पूछना होगा, आखिर एक छात्र कब तक सहेगा? सहनशीलता की भी तो एक सीमा होती है। जब सरकार ही अन्याय के सामने मौन हो जाएं, तो सड़क ही आखिरी अदालत बन जाती है और जब सरकार उसी सड़क पर बल का इस्तेमाल करती है, तो संदेश साफ हो जाता है, कुर्सी बचाने के लिए समझौता संभव है, पर सवाल पूछने वाले के लिए नहीं।
तीन कड़वे सच:
- भरोसे का संकट: परीक्षा प्रणाली अगर निष्पक्ष नहीं रही, तो मेरिट का कोई मतलब नहीं रह जाता। फिर डॉक्टर कौन बनेगा, यह अंक नहीं, पहुंच तय करेगी।
- आर्थिक लूट: एक लीक पेपर के पीछे कोचिंग, दलाल, और नकल माफिया का पूरा तंत्र खड़ा है। इस लूट में सबसे ज्यादा गरीब और मध्यम वर्ग का परिवार पिसता है।
- राजनीतिक उदासीनता: जब 22 लाख परिवार आंदोलित हों, और जवाब सिर्फ बैरिकेड और बयान हो, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
सरकार कह सकती है कि जांच चल रही है, कठोर कानून बनेंगे। छात्रों का कहना है कि अब शब्द नहीं, कार्रवाई चाहिए। दोनों के बीच में फंसा है एक 17-18 साल का बच्चा, जो यह तय नहीं कर पा रहा कि अगली बार फॉर्म भरे या खेत बेचे। यह लेख किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं है। यह उस व्यवस्था के खिलाफ है जो बार-बार अपने भविष्य निर्माताओं को ही संदिग्ध बना देती है।
अगर आज हम चुप रहे, तो कल कोई और परीक्षा लीक होगी। कोई और माँ गहने बेचेगी। कोई और बाप खेत गिरवी रखेगा। और कोई और बच्चा जंतर-मंतर पर यह पूछता मिलेगा, मेरी गलती क्या थी? देश को जवाब चाहिए। और वह जवाब लाठी से नहीं, पारदर्शिता से, त्वरित न्याय से और दोषियों पर ठोस कार्रवाई से आएगा। वरना अगली बार जब पेपर लीक होगा, तो साथ में सिर्फ प्रश्नपत्र नहीं जाएगा। देश का भरोसा भी जाएगा।





























