जब सवालों से डरने लगी सत्ता की तस्वीर
नई दिल्ली। जंतर-मंतर की धरती एक बार फिर गवाह बनी उस आक्रोश की, जो अब सड़कों से सीधे सत्ता के दरवाजे तक पहुंच चुका है। देश भर में लगातार हो रहे पेपर लीक और भर्ती घोटालों के खिलाफ छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन जारी है। मांग एक ही है – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। लेकिन इस बार प्रदर्शन की सबसे बड़ी खबर आंदोलन नहीं, बल्कि आंदोलन को कवर करने पहुंचे राष्ट्रीय मीडिया का बहिष्कार है।
“गोदी मीडिया गो बैक” के नारे से कांपा मंच
सुबह 10 बजे जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटी, “गोदी मीडिया गो बैक”, “सवाल पूछो जवाब दो” और “दलाली बंद करो” के नारे गूंजने लगे। छात्रों का साफ कहना था कि जब तक कैमरा सच नहीं दिखाएगा, तब तक उसे अंदर नहीं आने दिया जाएगा। प्रदर्शनकारियों के अनुसार आजतक, एनडीटीवी, एबीपी न्यूज सहित कई बड़े राष्ट्रीय चैनलों के रिपोर्टरों और ओबी वैन को जंतर-मंतर परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। बैरिकेड के बाहर ही उन्हें रोक दिया गया। एक छात्र नेता ने मंच से कहा, “देश का युवा अब पढ़ा-लिखा है। वह समझता है कि 2 मिनट की डिबेट में 10 सेकंड खबर और 1 मिनट 50 सेकंड भक्ति क्यों दिखाई जाती है। जब सरकार गिरने के कगार पर है तो कैमरा सिर्फ ताली बजाने के लिए नहीं चल सकता।”
सरकार की नाकामी, मीडिया की मजबूरी
पेपर लीक का मुद्दा अब सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष लगातार इसे सरकार की नीयत पर सवाल बता रहा है। एनडीए के पास पूर्ण बहुमत नहीं होने के कारण सत्ता गलियारों में भी बेचैनी है। ऐसे में जंतर-मंतर पर डटे “नौनिहालों” को कमजोर करने के हर सरकारी प्रयास नाकाम साबित हुए हैं।विश्लेषकों का मानना है कि सरकार जानती है कि अगर इस आंदोलन की तस्वीरें बिना फिल्टर के टीवी पर चली गईं, तो इसका असर सीधे संसद और सड़क दोनों पर पड़ेगा। इसीलिए मीडिया को अंदर न आने देने का फैसला छात्रों की तरफ से एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
भरोसा टूटा तो दरवाजे बंद हुए
पिछले 2 साल में NEET, UGC-NET, SSC और राज्य स्तर की दर्जनों परीक्षाओं में पेपर लीक सामने आए हैं। लाखों छात्र साल भर मेहनत करते हैं और एक रात में उनका भविष्य PDF में बिक जाता है। छात्रों का आरोप है कि ऐसे समय में गोदी मीडिया ने सरकार से सवाल पूछने के बजाय मुद्दे को दबाने का काम किया। “जब हमारे भविष्य पर डाका पड़ा तो एंकर मौन थे। आज जब हम जवाब मांग रहे हैं तो लाइव करने आ रहे हैं?” – यही सवाल आज जंतर-मंतर की दीवारों पर लिखा दिखा।
क्या बदलेगा समीकरण?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं है। यह मीडिया और जनता के रिश्ते में आए दरार की सार्वजनिक घोषणा है। जब जनता खुद तय करने लगे कि किसे सुनना है और किसे नहीं, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी जवाबदेही के कटघरे में आ जाता है। आज जंतर-मंतर ने बता दिया कि तानाशाही सिर्फ कानून से नहीं चलती, नैरेटिव से भी चलती है। और जब नैरेटिव टूटता है तो “नो एंट्री” का बोर्ड सबसे पहले उन्हीं के लिए लगता है जो सच से मुंह मोड़ लेते हैं। सरकार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। छात्रों ने ऐलान किया है कि जब तक शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, यह आंदोलन और तेज होगा। और हां, कैमरा वही चलेगा जो सवाल पूछेगा।































