Home उत्तराखंड जो खुद जनसमस्या हैं, वही लगा रहे हैं “जनता दरबार”

जो खुद जनसमस्या हैं, वही लगा रहे हैं “जनता दरबार”

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“जो खुद ही जनसमस्या है, वही जनसमस्याओं के निवारण के लिए जनता दरबार लगा रहा है।” उत्तराखंड की नौकरशाही की मौजूदा तस्वीर यही व्यया कर रही है।

एक दौर था, जब गांव की समस्या का समाधान गांव में ही हो जाता था। पटवारी के दरवाजे पर दस्तक होती थी और लेखपाल की कलम से ही किसान को न्याय मिल जाता था। व्यवस्था में एक क्रम था, एक प्रोटोकॉल था, एक जवाबदेही थी।

और एक दौर आज का है। आज पीड़ित की फरियाद पटवारी तक पहुंचती ही नहीं। क्योंकि पीड़ित को सिखा दिया गया है कि सिस्टम से नहीं, “सिस्टम के आदमी” से काम होता है। ऊपर से फोन कराओ, फोटो खिंचवाओ और काम हो गया मान लो। निराकरण उस अधिकारी से कराया जा रहा है, जिसके पास न उस विषय की जानकारी है, न उसका अधिकार क्षेत्र। प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर सिर्फ अपनी पहुंच दिखाने की होड़ मची है।

इसे ऐसे समझिए – एक व्यक्ति के पेट में असहनीय दर्द हुआ। वह अस्पताल भागा। वहां उसने अपने परिचित डॉक्टर को ढूंढा। डॉक्टर साहब ने देखा, आत्मीयता दिखाई और दवा लिख दी। मरीज संतुष्ट होकर घर लौट गया। दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। पता चला कि जिसे उसने अपना मसीहा समझा था, वह हड्डी रोग विशेषज्ञ था। उसे पथरी का दर्द था, जिसके लिए उसे पेट रोग विशेषज्ञ के पास भेजा जाना चाहिए था। पर परिचित होने के अहंकार में रेफर करना भी जरूरी नहीं समझा गया।

आज उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था भी इसी “हड्डी वाले डॉक्टर से पेट का इलाज” कराने जैसी हो गई है।

जब नौकरशाह बेलगाम हो जाए तो जनता क्या करे? दुर्भाग्य से उत्तराखंड में कई कुर्सियां ऐसी हैं, जिन पर बैठे लोगों को यह तक नहीं पता कि उस कुर्सी का दायित्व क्या है, उसकी मर्यादा क्या है। वे अधिकारी नहीं, जनसमस्या बन चुके हैं। जनता दरबार उनके लिए समस्या सुनने का मंच नहीं, बल्कि अखबार में फोटो छपवाने और अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का इवेंट बन गया है।

और इसके लिए सिर्फ नौकरशाह दोषी नहीं हैं। यह राजनैतिक संरक्षण का दुष्परिणाम है। जब-जब सत्ता बदली, कुर्सियों का बंटवारा योग्यता से नहीं, वफादारी से हुआ। “मेरा आदमी” की संस्कृति ने “योग्य आदमी” की परम्परा को खा लिया। चहेतों को महत्वपूर्ण पद देकर सत्ता ने अपना काम तो निकाल लिया, लेकिन राज्य को पीछे धकेल दिया। आज उत्तराखंड विकास के लिए तरस रहा है तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है – हमने संस्थाओं से बड़े व्यक्ति बना दिए।

जरूरत क्या है?

  1. प्रोटोकॉल की वापसी : पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी और तहसील स्तर को फिर से सशक्त करना होगा। हर समस्या मुख्यमंत्री या जिलाधिकारी के जनता दरबार में नहीं सुलझेगी।
  2. जवाबदेही का निर्धारण : जनता दरबार में आई शिकायत का निस्तारण हुआ या नहीं, इसकी ट्रैकिंग होनी चाहिए, न कि सिर्फ प्रार्थना-पत्र लेकर रद्दी में डाल दिया जाए।
  3. विशेषज्ञता का सम्मान : जिस काम का जो विशेषज्ञ है, काम उसी से कराया जाए। जुगाड़ से नहीं, व्यवस्था से राज्य चलेगा।

जनता दरबार जनता के लिए होता है, जनसमस्या बने अधिकारियों के महिमामंडन के लिए नहीं। जब तक कुर्सी पर बैठा व्यक्ति खुद को सेवक नहीं, शासक समझेगा, तब तक पथरी के दर्द से मरने वालों की संख्या बढ़ती ही रहेगी।