लेखिका : स्मिता साह ‘स्वयं’
विधा : शायरी / भावात्मक काव्य
प्रकाशक : अविचल प्रकाशन
‘शायराना स्वयं’ स्मिता साह ‘स्वयं’ का ऐसा शायरी-संग्रह है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रतीक्षा, रिश्तों की जटिलता, अकेलापन और आत्मबोध एक-दूसरे में घुलते हुए दिखाई देते हैं। यह पुस्तक केवल किसी प्रिय को पाने या खोने की कथा नहीं है, बल्कि प्रेम के बहाने स्वयं को पहचानने और अपने भीतर की स्त्री से संवाद करने की यात्रा है।

लेखिका की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भावनात्मक सहजता और आत्मीयता है। उनके शब्दों में कृत्रिम साहित्यिक आडंबर नहीं, बल्कि अनुभूतियों की सीधी और ईमानदार अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि पाठक अनेक रचनाओं में अपने जीवन के अनकहे अनुभवों को पहचान लेता है। प्रेम यहाँ केवल मिलन नहीं, बल्कि इंतज़ार, दूरी, स्मृति और मौन का भी नाम है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और शायराना है। हिंदी के साथ उर्दू-फ़ारसी शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग रचनाओं को भावात्मक गहराई देता है। चाँद, बारिश, चाय, हवाएँ, रास्ते और किताबें जैसे सामान्य प्रतीक लेखिका के यहाँ रिश्तों और जीवन के अर्थों को व्यक्त करने लगते हैं। विशेष रूप से चाँद को जीवन के उतार-चढ़ाव से जोड़ना उनकी प्रतीकात्मक दृष्टि को दर्शाता है। इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री का आत्मबोध है। यहाँ स्त्री केवल प्रेम में प्रतीक्षा करती हुई नहीं, बल्कि स्वयं को सँवारने, समझने और संघर्षों के बीच अपने लिए नए वादे करने वाली स्त्री भी है। डिजिटल युग का अकेलापन, बदलते रिश्ते और सामाजिक दिखावे पुस्तक के सामाजिक सरोकार को विस्तार देते हैं।
समीक्षा को केवल प्रशंसा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा।एक साहित्यिक आलोचना किसी भी साहित्य की पूर्ण समीक्षा होती है इस पक्ष को ध्यान में रखते हुए यह लिखना आवश्यक है कि…..
संग्रह की रचनाओं में भावों की प्रामाणिकता स्पष्ट है, लेकिन कई जगह एक ही भाव—विशेषकर प्रेम, प्रतीक्षा, दूरी और याद—बार-बार अलग शब्दों में लौटता है। कुछ रचनाएँ एक-दूसरे की भावभूमि से काफी मिलती-जुलती हैं। पुस्तक का संपादन यदि विषयगत खंडों के आधार पर अधिक कसाव के साथ किया जाता तो इसकी साहित्यिक प्रभावशीलता और बढ़ सकती थी।
फिर भी ‘शायराना स्वयं’ की मूल शक्ति उसकी भावों की प्रामाणिकता है। यह पुस्तक प्रेम को पाने से अधिक उसे जीने और अंततः स्वयं को पाने की कथा कहती है। सच तो यह है कि यहाँ ‘स्वयं’ केवल लेखिका का नाम नहीं, बल्कि पूरी पुस्तक की आत्मा है। ‘शायराना स्वयं’ उन भावनाओं की किताब है जिन्हें हम कह नहीं पाते, लेकिन पढ़ते हुए पहचान लेते हैं कि वे हमारे भीतर भी कहीं मौजूद थीं।
ललिता कापड़ी
हल्द्वानी उत्तराखंड
7895572889
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