हल्द्वानी। मोटहल्दू की मदरसन फैक्ट्री में कुछ दिन पूर्व जो कुछ हुआ वह सिर्फ ख़बर नहीं, एक सवाल है। जब मजदूर अपने हक के लिए चुपचाप बैठे थे, तब सिस्टम खामोश क्यों था? और जैसे ही उनकी आवाज़ को सहारा मिला, कानून की धाराएँ जाग क्यों गईं? क्या इस देश में न्याय की आवाज़ को गुंडा कहकर दबा देना आसान हो गया है? कम्पनी झुकती है तो सवाल उठता है मजदूर सही थे या दबाव भारी था? और पुलिस सख्त होती है तो सवाल वही रहता है सच के साथ कौन खड़ा है? मोटाहल्दू की मदरसन फैक्ट्री के बाहर कुछ दिन पहले तक मजदूर अपनी 14 मांगों को लेकर शांतिपूर्ण धरने पर थे। कोई पत्थर नहीं चला, कोई नारा हिंसा में नहीं बदला। लेकिन उनकी बात सुनी भी नहीं गई। फिर कुछ समाजसेवी उनके समर्थन में आए और अचानक तस्वीर बदल गई। कम्पनी प्रबंधन ने 14 में से 12 मांगें मान लीं।यानी, जो आवाज़ पहले अनसुनी थी, वो अचानक ज़रूरी हो गई। अब असली सवाल यहीं से शुरू होता है अगर मांगें जायज नहीं थीं, तो मानी क्यों गईं? और अगर जायज थीं, तो पहले क्यों नहीं मानी गईं? लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जैसे ही मजदूरों को समर्थन मिला, पुलिस हरकत में आ गई। यानी, मजदूर अगर अकेला है तो उसकी आवाज़ कमजोर है और अगर कोई उसके साथ खड़ा हो जाए तो वो अराजक तत्व हो जाता है? पुलिस कहती है बाहरी लोग माहौल बिगाड़ रहे थे, हिंसा की साजिश थी। ठीक है, अगर ऐसा है तो जांच होनी चाहिए, दोषियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन क्या हर समर्थन साजिश होता है? क्या हर विरोध “वर्चस्व की लड़ाई” बन जाता है? और सबसे बड़ा सवाल जब मजदूरों का शोषण हो रहा था, तब श्रम विभाग कहाँ था? क्यों 14 मांगों में से 12 मांगें तभी मानी गईं, जब मामला तूल पकड़ गया? यह वही पुराना पैटर्न है पहले अनदेखी फिर दबाव फिर कार्रवाई लेकिन किस पर?सिस्टम अक्सर ताकतवर के साथ खड़ा दिखता है, और सवाल पूछने वाले पर कानून की धाराएँ लगा देता है। कानून का काम डर पैदा करना नहीं, भरोसा बनाना है। अगर हर आवाज़ को अराजकता कह दिया जाएगा, तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क क्या रह जाएगा? मजदूरों का हक हक है, अपराध नहीं।और अगर कोई उनके हक की बात करता है, तो उसे गैंगस्टर कह देना यह सवाल उठाता है, जवाब नहीं देता। अब देखना यह है जांच निष्पक्ष होगी या कहानी फिर से एकतरफा लिखी जाएगी? क्योंकि असली मुद्दा सिर्फ मदरसन फैक्ट्री नहीं है मुद्दा है सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत का।

पुलिस प्रताड़ना झेल रहे समाजसेवी पियूष जोशी का सुशीला तिवारी हॉस्पिटल में उपचार जारी

मोटाहल्दू स्थित मदरसन प्राइवेट लिमिटेड में हुए श्रमिक आंदोलन के बाद पुलिस प्रताड़ना झेल रहे समाजसेवी पियूष जोशी का सुशीला तिवारी हॉस्पिटल में उपचार जारी है। इस बीच राजनीतिक समर्थन लगातार बढ़ता नजर आ रहा है।
उत्तराखंड विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी ने फोन पर पियूष जोशी से बातचीत कर उनका हालचाल जाना। बातचीत के दौरान उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह जल्द ही हल्द्वानी पहुंचकर स्वयं मुलाकात करेंगे और इस पूरे मामले में उनके साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। भुवन कापड़ी ने कहा कि श्रमिकों के हक की आवाज उठाने वालों के साथ इस तरह का व्यवहार कतई स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच की मांग भी की और कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो इस मुद्दे को विधानसभा स्तर पर भी उठाया जाएगा।

इधर, पियूष जोशी के समर्थन में क्षेत्र के श्रमिकों और सामाजिक संगठनों में भी आक्रोश बना हुआ है। लोगों का कहना है कि श्रमिक आंदोलन को दबाने के लिए की गई कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।





























