NEET पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और NTA के 47 अधिकारियों की बर्खास्तगी, दोनों ही खबरें 25 जुलाई को एक साथ आईं। जंतर-मंतर पर 36 दिन से चल रहे धरने के बाद यह फैसला आया। छात्र इसे अपनी जीत बता रहे हैं, और स्वाभाविक रूप से खुशी भी है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ कुर्सी बदलने और कुछ अफसरों को हटाने से देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षा की साख वापस आ जाएगी?
जवाबदेही तय हुई, पर देर से
किसी भी लोकतंत्र में सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी सबसे ऊपर होती है। NEET जैसी परीक्षा से 24 लाख छात्रों का भविष्य जुड़ा है। पेपर लीक, नकल और धांधली की खबरें बार-बार आएं, और संस्था कहे कि “सब ठीक है”, तो विश्वास टूटता है। इस लिहाज से मंत्री का इस्तीफा और NTA में सफाई जरूरी थी। पर इसे इतना लंबा खिंचने की जरूरत नहीं थी। छात्रों को सड़क पर 36 दिन नहीं बिताने पड़ते अगर समय रहते संवाद और पारदर्शिता होती।
समस्या व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है
NTA से 47 अधिकारियों को हटाना एक संकेत है। पर असली चुनौती अब शुरू होगी। हर साल लाखों छात्र एक ही दिन, एक ही पेपर पर निर्भर हैं। इतने बड़े पैमाने पर परीक्षा कराना अपने आप में जोखिम है। पेपर छपाई से लेकर सेंटर आवंटन, सीसीटीवी, बायोमैट्रिक तक हर कड़ी में सेंध लग सकती है।
इसलिए 3 काम तुरंत करने होंगे:
- तकनीक और सुरक्षा: मल्टी-शिफ्ट, पेपर सेट का रैंडमाइजेशन, ब्लॉकचेन आधारित ट्रैकिंग। पेपर लीक हो तो 24 घंटे में पता चल जाए।
- NTA का पुनर्गठन: एक स्वायत्त, विशेषज्ञों की संस्था। राजनीति और ठेकेदारी से दूर। परीक्षा के बाद तुरंत ऑडिट की व्यवस्था।
- छात्रों से संवाद: कोई भी बड़ा बदलाव बिना छात्रों और शिक्षकों से बात किए न हो। शिकायत निवारण के लिए स्वतंत्र ओम्बड्समैन।
आंदोलन की सीख
जंतर-मंतर के इस आंदोलन ने दिखाया कि युवा अब चुप नहीं बैठेंगे। सोशल मीडिया और एकजुटता से वे सत्ता को झुका सकते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। पर आंदोलन के बाद निर्माण की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। सरकार को चाहिए कि इस ऊर्जा को नीति बनाने में लगाए। इस्तीफा एक अंत है, शुरुआत नहीं। अगर नए मंत्री और नई NTA सिर्फ नाम बदलकर वही पुरानी गलतियां दोहराएंगे, तो अगले साल फिर जंतर-मंतर भर जाएगा। देश को टॉपर नहीं, भरोसेमंद प्रणाली चाहिए। अब गेंद सरकार के पाले में है।































