ललिता कापड़ी, हल्द्वानी
आज यदि हजारों वर्ष पीछे मुड़कर देखा जाए, तो हमने यही पाया कि भारत की गुलामी के दो मुख्य कारण थे— अशिक्षा और देशद्रोह। शिक्षा व्यक्ति को विचारशील बनाती है। पहले स्वयं का आंकलन, फिर समाज का आंकलन और अंततः देश का आंकलन करना सिखाती है। देशभक्ति हमें सिखाती है कि निजी स्वार्थ, निजी धर्म और निजी समुदाय से ऊपर उठकर प्रत्येक कार्य राष्ट्र की मजबूती और अखंडता के लिए किया जाए।
समाज से देश तक पहुँचने वाली पहली सीढ़ी विद्यालय होते हैं। शिक्षा व्यवस्था में वह शक्ति होती है, जो एक परिवार, फिर समाज और अंततः पूरे देश की दिशा और दशा बदलने की क्षमता रखती है। आज ऐसा महसूस होता है कि माता-पिता और हमारी अनेक शैक्षिक नीतियों ने शिक्षा तंत्र को बुरी तरह जकड़ दिया है। 21वीं सदी में प्रवेश करते-करते ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था अनेक शैक्षिक कुरीतियों से घिर गई है। ऐसा नहीं है कि ये कुरीतियाँ दिखाई नहीं दे रहीं। सब कुछ दिख रहा है, सब समझ में आ रहा है, लेकिन अधिकांश लोग मौन हैं। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है?
आज जो पीढ़ी सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही है, उसे देखकर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि पिछले दो दशकों की शिक्षा व्यवस्था और पालन-पोषण ने उसे किस दिशा में तैयार किया है। इससे यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि अभिभावक किस मानसिकता के साथ अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हैं और विद्यालय किस दृष्टिकोण से विद्यार्थियों का निर्माण कर रहे हैं। प्रदर्शनों के दौरान अनेक स्थानों पर युवाओं द्वारा प्रयोग की गई अभद्र भाषा इस बात पर गंभीर चिंतन की माँग करती है कि कक्षा एक से बारह तक उन्हें केवल विषयों का ज्ञान मिला या संस्कारों का भी।
शायद हमने अपने बच्चों को यह तो सिखाया कि अन्याय और गलत के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए, लेकिन यह सिखाने में कहीं न कहीं चूक गए कि गलत के विरोध का भी एक संस्कारित, संयमित और लोकतांत्रिक तरीका होता है। किसी एक गलत का प्रतिकार करने के लिए दूसरा गलत कभी समाधान नहीं बन सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, पर उसकी गरिमा तभी तक सुरक्षित रहती है, जब तक उसका प्रयोग मर्यादा, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ किया जाए। जब विरोध अपनी भाषा, व्यवहार और आचरण की सीमाएँ लाँघ देता है, तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है और संदेश से अधिक उसका तरीका चर्चा का विषय बन जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरी व्यवस्था पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, फिर भी यदि चरित्र, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़ रहे हैं, तो हमें शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार करना ही होगा। जब पहली बार किसी बच्चे के मुख से गाली निकली, तब उसे रोकने के बजाय अक्सर उसका दोष शिक्षक पर मढ़ दिया गया। जब किसी शिक्षक ने अनुशासन स्थापित करने का प्रयास किया, तो कई बार अभिभावक उसके विरुद्ध खड़े हो गए। कागज़ों में जो शैक्षिक व्यवस्था दिखाई देती है, क्या वह वास्तव में धरातल पर भी उतनी ही प्रभावी है? घर से बाहर निकलते ही नशे की गिरफ्त में आते युवा खुलेआम दिखाई देते हैं। शिक्षक कई बार सब कुछ देखकर भी अनदेखा करने को विवश हो जाता है, क्योंकि उसे भय रहता है कि कहीं उसी पर आरोप न लगा दिए जाएँ।
यदि कोई शिक्षक शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाए, तो उसे अपने स्थानांतरण, पदोन्नति या अन्य प्रशासनिक परिणामों की चिंता सताने लगती है।
जिन विद्यालयों में अभिभावक लाखों रुपये की फीस देते हैं, वहाँ भी कई बार शिक्षक बच्चे के अनुचित व्यवहार पर खुलकर कुछ नहीं कह पाता। यदि उसने कहा, तो प्रबंधन और अभिभावकों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि शिक्षक से अपेक्षा केवल प्रशंसा करने की रह गई है। बच्चों की भी, अभिभावकों की भी और प्रबंधन की भी। यह शिक्षा तंत्र का केवल एक पक्ष है। ऐसे न जाने कितने पहलू हैं, जिन पर गंभीर राष्ट्रीय स्तर पर विचार करने की आवश्यकता है। यदि हमें केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि चरित्रवान, संवेदनशील, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक चाहिए, तो शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों, समाज और शासन, सभी को मिलकर आत्ममंथन करना होगा। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में लिखा जाता है। यदि शिक्षा सही दिशा में होगी, तो समाज स्वतः सही दिशा में बढ़ेगा; और यदि शिक्षा अपने उद्देश्य से भटक गई, तो उसका मूल्य आने वाली पीढ़ियाँ चुकाएँगी।





























