लोकतंत्र तीन पहियों पर चलता है – विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उसे लागू करती है, और न्यायपालिका उसकी व्याख्या करती है। मॉन्टेस्क्यू ने दो सौ साल पहले ही कह दिया था कि जब तक ये तीनों शक्तियां अलग-अलग रहेंगी, तभी तक नागरिक की स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी। आज सवाल यही है कि जब ये तीनों “एक ही छत के नीचे” दिखने लगें तो क्या होगा? विधायिका जब अपनी जवाबदेही से मुंह मोड़कर कार्यपालिका की कठपुतली बन जाए। कार्यपालिका जब कानून के बजाय आदेश से चले और न्यायपालिका पर जब सत्ता, प्रलोभन या दबाव की परछाई पड़ने लगे। तब जांच एजेंसियां, नियुक्तियां, तबादले, ठेके, सब एक ही मेज पर तय होने लगते हैं।
नतीजा, भ्रष्टाचार केवल पैसों का नहीं रह जाता। वह संस्थाओं का हो जाता है। वह सिस्टम में इस तरह बैठ जाता है कि उसे “व्यवस्था” कहकर जायज ठहराया जाने लगता है। फाइल अटकती है तो समाधान फोन से होता है। नियम तोड़ना आम हो जाता है और आम आदमी को लगता है कि बिना “जुगाड़” के अब कुछ नहीं होगा।
भ्रष्टाचार बढ़ता क्यों है?
- जवाबदेही का अभाव: जब निगरानी करने वाला और निगरानी में रहने वाला एक ही दल, एक ही विचार, एक ही हित साधने लगे तो सवाल पूछेगा कौन?
- संतुलन का टूटना: Checks and Balances कमजोर होते ही सत्ता का केंद्रीकरण होता है। और जहां केंद्रीकरण है वहां सौदेबाजी भी है।
- डर और प्रशंसा का मिश्रण: आलोचना को “देशद्रोह” और चापलूसी को “राष्ट्रभक्ति” कह दिया जाए तो सच्चाई सबसे पहले दम तोड़ती है।
तो कब तक?
भ्रष्टाचार तब तक है जब तक हम इसे सुविधा मानते रहेंगे। तब तक है जब तक वोट जाति, धर्म और मुफ्त के नाम पर पड़ेगा, काम के नाम पर नहीं। तब तक है जब तक मीडिया सवाल कम और प्रेस रिलीज ज्यादा छापेगा। तब तक है जब तक न्याय मिलने में सालों लगेंगे और अन्याय चंद घंटों में। लेकिन भ्रष्टाचार हमेशा नहीं रहता। इतिहास गवाह है कि हर बार जब संस्थाएं कमजोर हुईं, समाज ने उन्हें फिर खड़ा किया।
रास्ता क्या है?
- पारदर्शिता: हर नियुक्ति, हर ठेका, हर फंड ऑनलाइन। अंधेरा भ्रष्टाचार की पहली शर्त है।
- स्वायत्तता: चुनाव आयोग, CBI, CVC, न्यायपालिका की नियुक्तियों में कार्यपालिका का एकाधिकार खत्म हो। चयन समितियों में विपक्ष और विशेषज्ञ हों।
- नागरिक की भूमिका: RTI का उपयोग, स्थानीय स्तर पर निगरानी, और सबसे जरूरी – सत्ता को भगवान न मानना।

लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं है। इसका मतलब है तीनों स्तंभों का अपने-अपने दायरे में रहना। एक छत सबको धूप-बारिश से बचाती है, लेकिन अगर उसी छत के नीचे सब फैसले होने लगें तो घर में हवा आना बंद हो जाती है। और जहां हवा नहीं, वहां सड़ांध जरूर आती है।
भ्रष्टाचार कब तक?
जब तक हम चुप हैं, तब तक। जिस दिन हम पूछना शुरू करेंगे – “यह फाइल क्यों रुकी?”, “यह नियुक्ति कैसे हुई?”, “यह फैसला किस नियम से आया?” – उसी दिन से गिनती शुरू हो जाएगी।क्योंकि लोकतंत्र को बचाने का ठेका न नेताओं के पास है, न अफसरों के पास। वह ठेका हमारे पास है।































