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आतंक का डिजिटलीकरण

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ललिता कापड़ी, हल्द्वानी

पहले के जमाने में संयुक्त परिवार हुआ करते थे। घर इतना बड़ा होता था कि अगर किसी का मूड खराब हो जाए, तो उसे गुस्सा निकालने के लिए अलग से इंटरनेट पैक नहीं चाहिए होता था।

चार बहुएँ, दो जेठानियाँ, एक सास, दो ननदें और बोनस में पड़ोस की चाची! सुबह चूल्हा जलता था, दोपहर तक बहस और शाम होते-होते सब फिर एक ही थाली में पकौड़े खाते दिखाई देते थे। गुस्सा भी स्वदेशी था, इसलिए घर की चारदीवारी लाँघकर बाहर नहीं जाता था।

फिर आधुनिकता आई। परिवार “हम दो, हमारे दो” तक सिमट गए। रिश्ते कम हुए, लेकिन मोबाइल बड़े हो गए। अब घर में बहस के लिए लोग कम पड़ गए, तो इंसान ने पूरी दुनिया को अपना पड़ोसी बना लिया।

आज किसी ने चाय की फोटो डाली तो पचास विशेषज्ञ हाज़िर—
“दूध पहले डालना चाहिए था।”

किसी ने कविता लिखी तो साहित्य के स्वयंभू महापंडित प्रकट—
“इसमें रस नहीं है, अलंकार कम हैं और भाव तो बिल्कुल किराए के लग रहे हैं!”

किसी ने मंदिर की फोटो डाली तो धर्मशास्त्र खुल गया। किसी ने मस्जिद की तस्वीर लगा दी तो इतिहास जाग गया। किसी ने बिल्ली का वीडियो डाल दिया तो वहाँ भी दो गुट बन गए—एक बिल्ली समर्थक, दूसरा कुत्ता मोर्चा।

अब तो हाल यह है कि लोग सुबह भगवान का नाम बाद में लेते हैं, पहले नोटिफिकेशन देखते हैं कि रात भर किससे लड़ाई अधूरी रह गई।

वैसे यह सुविधा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुषों ने भी इस क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। पहले चौपाल पर बैठकर राजनीति समझाते थे, अब कमेंट बॉक्स में देश चलाते हैं। घर में पत्नी की एक नहीं चलती, लेकिन फेसबुक पर पाँच देशों की विदेश नीति तय कर देते हैं।

और सबसे रोचक पात्र वे हैं जिन्हें हर विषय पर विशेषज्ञता प्राप्त है। क्रिकेट हो, चंद्रयान हो, अर्थव्यवस्था हो, शिक्षा हो, विवाह हो या पड़ोसी की सब्ज़ी—उनकी राय अंतिम होती है। ऐसा आत्मविश्वास तो शायद ब्रह्माजी को भी सृष्टि रचते समय नहीं रहा होगा।

असल में सोशल मीडिया कोई युद्धभूमि नहीं है, यह तो एक विशाल दर्पण है। जिसके भीतर जितनी कुंठा, उतनी लंबी टिप्पणी। जितना खाली समय, उतनी गहरी बहस। जितना कम ज्ञान, उतना अधिक आत्मविश्वास।

पहले लोग घर में भड़ास निकालकर शांत हो जाते थे। अब भड़ास निकालने के लिए पूरी दुनिया ऑनलाइन मिल जाती है। फर्क बस इतना है कि पहले झगड़े के बाद चाय साथ पी ली जाती थी, अब लोग एक-दूसरे को ब्लॉक करके विजय पताका फहरा देते हैं।

इसलिए अगली बार जब किसी पोस्ट के नीचे सौ कमेंटों का महाभारत चलता दिखाई दे, तो घबराइए मत। समझ लीजिए, संयुक्त परिवारों की परंपरा अब डिजिटल अवतार में जीवित है।

युग बदल गया है, माध्यम बदल गया है, लेकिन इंसान का स्वभाव आज भी वही है—बस आँगन की जगह अब टाइमलाइन ने ले ली है।