शशि कुड़ियाल “चंद्रभा”
एक ही चेहरे पे यहां कितने नक़ाब हैं,
दिल में रंजिश बेपनाह और लब पे आदाब हैं।
राजदारों को डर है कि पर्दा उठ न जाए कहीं,
बेफ़िक्र बैठे हैं वो, ज़िंदगी जिनकी खुली किताब है।
चिरागों से कह दो गुमान न करें रौशनी देने का,
हमें तो राह खुद दिखाता आफ़ताब है।
कितने घावों पर मरहम रखें कितने दिल जोड़ें,
यहां तो हर चीज़ की टूटन बड़ी बेहिसाब है।
कुछ भरोसों ने भरोसे पर से भरोसा उठा दिया,
ये हकीकत है या कि कोई बुरा ख़्वाब है ?
बदलने को मजबूर करके फिर कहते हैं बदल गए,
वाह री दुनिया! तेरा दस्तूर भी लाज़वाब है।
ज़िंदगी के बगीचे में कांटो से भी यारी रखो दोस्तो,
देखा है कोई चमन जहां सिर्फ़ गुलाब है?































