Home उत्तराखंड 2027 से पहले मोदी की आहट और पहाड़ के सवाल

2027 से पहले मोदी की आहट और पहाड़ के सवाल

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2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, उत्तराखंड की सियासत में हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रीय दलों के नेता एक बार फिर जनता के द्वार पर हैं। इसी बीच सियासी गलियारों में चर्चा है कि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं देवभूमि में दस्तक दे सकते हैं। भाजपा संगठन ने अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन चर्चा है कि प्रधानमंत्री चम्पावत, रुद्रपुर-हल्द्वानी, पिथौरागढ़ या देहरादून में जनसभा कर सकते हैं। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा चम्पावत को लेकर है। यह सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है, लेकिन इस गढ़ में भी अब सेंध लगती दिख रही है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं। पहली, यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर सवर्ण वर्ग में भाजपा से दूरी बढ़ी है, जिसे भाजपा का कोर वोटर माना जाता था। दूसरी, जमीनी हकीकत। प्रदेश में सरकारी स्कूलों पर ताले, अस्पतालों का बिल्डिंग तक सिमट जाना और पहाड़ में आज तक डॉक्टर का न पहुंच पाना, ये सवाल हर चुनाव में वादे के रूप में आते हैं और चुनाव बाद फाइलों में बंद हो जाते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का दौरा भाजपा के लिए केवल जनसभा नहीं, बल्कि ब्रांड को रिचार्ज करने की कोशिश होगी। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी आज भी भाजपा के सबसे बड़े चेहरे हैं और उनकी एक हुंकार माहौल बदल सकती है। लेकिन इस बार समीकरण 2022 जैसा नहीं है। इस बार मैदान में यूकेडी भी पूरी ताकत से उतर रही है। गांव-गांव, घर-घर जाकर यूकेडी मूल निवास, भू-कानून और पहाड़ के मुद्दों को फिर से जिंदा कर रही है, जिससे क्षेत्रीय भावना का वोट एक बार फिर निर्णायक होता दिख रहा है। कुल मिलाकर 2027 का चुनाव सिर्फ मोदी के चेहरे और भाजपा की ब्रांडिंग पर नहीं लड़ा जाएगा। जनता अब पूछ रही है कि डबल इंजन की सरकार ने पहाड़ के लिए क्या किया? यदि भाजपा को इन सवालों का जवाब नहीं मिला तो प्रधानमंत्री की सभा भीड़ तो जुटा लेगी, लेकिन वोट में कितना बदलेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

मुद्दे तो बहुत हैं, पर जनमुद्दे अब सिर्फ बातों तक सिमट कर रह गए हैं। खैर, यह उत्तराखंड है…

यहाँ मुद्दे चुनाव में ही जिंदा होते हैं और चुनाव खत्म होते ही फाइलों में दफन हो जाते हैं। आज भी पहाड़ में स्कूल बंद होने पर चर्चा होती है, पर बंद होने से रोका नहीं जाता।‌ अस्पताल की बिल्डिंग बनने पर उद्घाटन होता है, पर डॉक्टर की तैनाती पर सवाल नहीं पूछा जाता। बेरोजगार नौकरी मांगता है तो उसे लाठी मिलती है, और भू-कानून मांगता है तो आश्वासन। हर दल के पास घोषणा पत्र में पहाड़ बचाने के वादे हैं, लेकिन सत्ता मिलते ही सबका पहाड़ प्रेम देहरादून की कुर्सी तक सिमट जाता है। जनता सब देख रही है, सब समझ रही है। वह सुनती सबकी है, पर अब भरोसा किसी पर जल्दी करती नहीं। शायद इसीलिए अब चुनाव में भीड़ तो बहुत दिखती है, पर भीतर का भरोसा कहीं गायब सा लगता है।