किशोर कुमार बोहरा, एच 196, प्रतापनगर जोधपुर
कल्पना विचार और अनुभूति का लयात्मक समन्वय ही किसी नई रचना को जन्म देता है, यह प्रमाण दिया है ललिता जी ने मैं ख़्वाब देखती हूं के माध्यम से। साहित्यिक रचना हृदय के इर्द गिर्द भावनाओं की अनुगूंज है,और अंतस के विषाद का शाब्दिक प्रस्फुटन है। कोई भी रचना हृदय की सफलतम अभिव्यक्ति होती है। भावनाओं के सागर की गहराई को हिमालय सी ऊंचाई रचना ही प्रदान करती है। यह शब्दों के होठों पर वेदना की मुस्कान है।यह बाहर के अँधेरों से लड़ती हुई हृदय के मंदिर में टिमटिमाते दीपक की रौशनी है।
मैं ख्वाब देखती हूं अनुभूति के सागर में तैरती हुई शब्द-नौकाओं की यात्रा है। कवियित्री ललिता जी की लेखनी में एक संवाद है और उन संवादों की व्यंजना ही एक उत्कृष्ट कृति के रूप में प्रस्तुत है मैं ख्वाब देखती हूं। इसका प्रत्येक शब्द मुखरित है। रचनाएं यथार्थ से जुड़ी है,इसमें भावबोध अधिक सघन है,अनुभूतिपरक अभिव्यक्तिया है। ललिता जी की रचनाओं में भाषा कहीं बाधा नहीं बनी है अपितु सहजता के साथ भावनाओं की अंगुली थामे चलती है। युवा कवियित्री और लेखिका ललिता जी का यह सार्थक प्रयास अविरल बहता हुआ हमे नई नई रचनाओं का अमृत पान करवाता रहे। हृदय में बहुत भाव है परंतु आप जैसी ऊर्जावान और प्रकाशवान लेखिका हेतु मेरी लेखनी में सामर्थ्य नहीं है। बस कलम कभी रुके नहीं। ढेर सारी शुभकामनाएं बधाई और आशीर्वाद अद्वितीय रचना के प्रकाशन पर।































