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बड़ा आदमी कौन

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शशि कुड़ियाल “चन्द्रभा”

बात उन दिनों की है जब मैं चौदह पंद्रह वर्ष की रही होंगी। अपने आसपास के वातावरण और परिवेश के वशीभूत होकर मैं प्राय मां से कहा करती कि मुझे बहुत बड़ा इंसान बनना है, मां मुस्कुरा कर रह जाती।

एक दिन पिताजी जो कि सागर की भांति गहरे और गंभीर थे उन्होंने मुझे पास बिठा कर पूछा “तुम बहुत बड़ी बनना चाहती हो न?” मैंने हां में गर्दन हिला दी तो उन्होंने कहा कि अच्छा बताओ बड़ा कौन होता है तो मैंने कहा बड़ा आदमी वह होता है जिसके पास बहुत सारा पैसा हो, जमीन जायदाद हो, बैंक बैलेंस हो, सब उसकी इज्जत करें, मुझे ऐसा ही बनना है।

इस पर पिताजी बड़े प्रेम से लेकिन गंभीरता पूर्वक बोले “तुमने जो कहा वह आधा सत्य है बेटी और पूरा सत्य यह है कि भौतिक वस्तुओं की सम्पन्नता से इंसान अमीर बनता है लेकिन बड़ा आदमी बनने के लिए उसके अंदर दया, सहनशीलता, ईमानदारी, सद्चरित्रता, विनम्रता जैसे गुण होने चाहिए। जो दूसरों को छोटा न समझे वास्तव में वही बड़ा है। और भौतिक वस्तुएं तो आनी जानी हैं, नश्वर हैं, आज हैं कल नहीं भी रह सकती हैं किंतु तुम्हारा सुंदर चरित्र, सद व्यवहार और सद्गुण तुमसे कभी कोई नहीं छीन सकता वे तो चिरस्थाई रहते हैं। हो सकता है कि एक अमीर आदमी की इज्जत लोग पैसे की वजह से करें लेकिन वास्तविक आदर वह है जो लोग तुम्हें एक व्यक्ति के तौर पर देते हैं।

इसलिए बेटा जीवन में पैसे से भले ही तुम जितने भी अमीर बन जाओ किंतु असली धनवान तुम अपने मानवीय गुणों से ही बनोगे।”

और वास्तव में उस दिन पिताजी से मिली उस सीख ने मेरे सोचने की दिशा बदल दी और मेरे जीवन को एक नया आयाम दिया। पिताजी सदा कहते थे कि भले ही तुम जीवन में आकाश की ऊंचाई को छू लो लेकिन पैर सदा जमीन पर रखना, विनम्रता का त्याग कभी नहीं करना। जिस दिन लोग तुम्हें तुम्हारे पद, प्रतिष्ठा, पैसे से बढ़कर तुम्हारी दया, करुणा, प्रेम, सच्चाई और विनम्रता के लिए आदर दें तो उस दिन समझना कि एक इंसान के तौर पर तुमने वाकई सफलता हासिल कर ली है।

पिताजी की इस सीख ने कभी भी मुझे जीवन में मानवता के पथ से डगमगाने नहीं दिया। आज पिताजी नहीं हैं किंतु उनकी शिक्षा और उनकी सीख सदैव मेरे पथ को प्रशस्त करती है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे महान पिता की बेटी हूं जो संस्कारों की पाठशाला थे और ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि हर जन्म में मुझे मेरे पिता जी ही पिता रूप में मिलें।