ललिता कापड़ी, हल्द्वानी उत्तराखंड
राम की साइड हो या रावण की? एक सवाल कौंध गया अचानक मेरे हृदय में। फिर एक के बाद एक भाव-भंगिमाएँ मन के आँगन में अठखेलियाँ करने लगीं। इस सवाल पर ही आश्चर्य होने लगा। मन हुआ कि ख़ुद के साथ-साथ कुछ अन्य लोगों से भी पूछा जाए।
आप बताइए कि राम की साइड हैं या रावण की?
एक बार तो मन ने कहा—“राम की साइड!”
फिर तुरंत दूसरा प्रश्न आ गया। इसका मतलब, तुम राम के गुणों का अनुसरण करना चाहते हो? अरे नहीं यार! इतना मुश्किल काम नहीं हो पाएगा। मन की ईर्ष्या, क्रोध, ‘मैं’ को छोड़ना इतना आसान नहीं है। लेकिन हूँ मैं राम की साइड।
अच्छा! तो तुम सीधा-सीधा रावण की साइड क्यों नहीं हो जाते?
अरे! इतना आसान नहीं रावण की साइड होना। भले ही अंदर से मैं रावण जैसा ही हूँ, पर बाहर से राम की साइड होना पड़ेगा। जीत तो राम की ही हुई थी। यदि रावण की जीत हुई होती, तो मैं पक्का रावण की ही तरफ़ होता। फिर तो सारा झमेला ही ख़त्म हो जाता।
झमेले की कौन-सी बात है इसमें?
तुम क्या जानो, मन तो रावण जैसा हो, लेकिन साइड राम की लेनी है, तो कितने टेंशन से गुज़रना पड़ता है! बार-बार अपने ही मन को छुपाना पड़ता है।
बात तो सही कही, दोस्त। पर एक बात है, उन लोगों को कोई टेंशन नहीं है, जो न तो राम की साइड हैं, न रावण की।
ऐसा कैसे?
अरे यार, देखो! वे दोनों को चुपचाप देखते रहते हैं। जब जहाँ जैसा मौका हुआ, चुपचाप उसकी साइड हो लेते हैं और हमेशा मज़े में रहते हैं।
कोई दिखावा करने की टेंशन ही नहीं।
अब बताओ, तुम किसकी तरफ़ हो? राम की साइड या रावण की? या फिर बीच में?
ये तो तुमने फिर उलझा दिया।
राम की साइड रहूँ या रावण की?

































