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वहम का आईना

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दया भट्ट ‘दया’

दूसरों के लिए
आप उतने अहम नहीं होते,
जितना अहम
आप स्वयं को समझ बैठते हैं।

यह आपका भ्रम है
कि आपके होने से
किसी की दुनिया चलती है,
आपके मौन से कोई बेचैन होता है,
या आपके दूर चले जाने से
किसी की ज़िंदगी ठहर जाती है।

सच तो यह है—
हर व्यक्ति अपनी ही उलझनों में उलझा है,
अपनी इच्छाओं, अपने अभावों
और अपने स्वार्थों के बीच
अपना संसार रचने में लगा है।

आपकी उपस्थिति
किसी के लिए आदत हो सकती है,
ज़रूरत हो सकती है,
कुछ पलों का सुकून हो सकती है—
पर हर रिश्ता
आपकी कल्पना जितना गहरा हो,
यह आवश्यक नहीं।

इसलिए
अपने होने का अभिमान मत पालिए,
और न ही किसी की उपेक्षा में
अपना मूल्य तलाशिए।

आपकी अहमियत दूसरों की प्राथमिकताओं से तय नहीं होती, और आपकी अनुपस्थिति किसी की दुनिया उजाड़ दे— यह अपेक्षा भी मत रखिए।

जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है—
लोगों के जीवन में अपना स्थान जानिए,
पर अपने जीवन में
अपना स्थान कभी मत खोइए।

क्योंकि अंततः
दूसरों के लिए अहम होना
सौभाग्य हो सकता है,
लेकिन अपनी नज़रों में
अर्थपूर्ण बने रहना
आपकी स्वयं के प्रति ज़िम्मेदारी है।