ज्योलीकोट में नल से जल नहीं, मौत आ रही है – सिस्टम कागजों में शुद्ध पानी पिला रहा है
दूषित पेयजल से दो की मौत, गांवों में हाहाकार, हाईकोर्ट ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया, पर लापरवाहों पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं
नैनीताल । पानी को जीवन कहते हैं, पर ज्योलीकोट में यही पानी अब मौत बन गया है। मामला गंभीर है, बहुत गंभीर। नैनीताल-दिल्ली मार्ग पर 17 किमी दूर बसे ज्योलीकोट और उसके आसपास के वीरभट्टी, छीणा, बेलुवाखान और सरियाताल में नलों से गंदा, बदबूदार, संदूषित पानी आ रहा है और उसे पीकर दो लोगों की मौत हो चुकी है। जी हां, दो जानें चली गईं। पर फाइलों में सब ठीक है। जमीनी हकीकत यह है कि जल संस्थान, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन सब कागजों में शुद्ध पानी पिला रहे थे। आखिर जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, अफसर तलब
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने वो किया जो प्रशासन को महीनों पहले करना चाहिए था। अदालत ने जिलाधिकारी नैनीताल, मुख्य चिकित्सा अधिकारी समेत जल संस्थान के संबंधित अधिकारियों को तलब कर लिया है। कोर्ट ने दो टूक पूछा – बताओ, गांव वालों को शुद्ध पानी क्यों नहीं मिला? और बीमारी फैलने के बाद भी व्यवस्था क्यों नहीं सुधरी?अदालत ने जल संस्थान को क्षेत्र में तत्काल स्वच्छ और संदूषणमुक्त पेयजल उपलब्ध कराने के कड़े निर्देश दिए हैं।
कटघरे में खड़ा सिस्टम, पर बे-खौफ
और यहीं सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। हाईकोर्ट ने तत्काल संज्ञान लेते हुए पूरे सिस्टम को ही कटघरे में खड़ा कर दिया, पर अफसोस सिस्टम कठघरे तक तो पहुंचा लेकिन लापरवाहों पर कोई भी कार्यवाही नहीं हुई। न सस्पेंशन, न जांच, न जवाबदेही। अब जब दो मौतों के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई तो ऐसे अधिकारियों के हौसले लापरवाही के प्रति और अधिक बढ़ते हुए ही नजर आएंगे। यह तय है।
‘हर घर जल’ सिर्फ कागजों में
यह सब बढ़ते भ्रष्टाचार का ही नतीजा है। राज्य में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया है कि पद पर बैठे अधिकारी को यह मालूम ही नहीं कि उसका दायित्व क्या है? उसको अपने कार्यों का भी ज्ञान नहीं है? जल संस्थान का नाम तो ‘जल संस्थान’ है, पर काम ‘जल में जहर मिलाओ संस्थान’ जैसा हो रहा है। महीनों से पाइप लीक, स्रोत दूषित, पर टेस्टिंग के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति। स्वास्थ्य विभाग बीमारी का इंतजार करता रहा, ताकि मरीज आएं तो गिनती हो।
नतीजा यह कि ‘हर घर नल, हर घर जल’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना भी सिर्फ कागजों में ही घर-घर पहुंची। जमीन पर नल है तो जल नहीं, जल है तो जहर है। विभाग जल की जांच करने तक से चूक गया और ज्योलीकोट जैसे छोटे से पहाड़ी क्षेत्र में दो लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। यह वही सिस्टम है जो जनसेवा के लिए बना है और उसी जनसेवा के लिए वेतन लेकर अपनी घर-गृहस्थी चलाता है। पर अफसोस, वेतन से तो ये घर-गृहस्थी चलाने में सफल रहा, लेकिन उस वेतन के बदले काम करने में पूरी तरह असफल रहा है। फिर चाहे वह किसी नेता-मंत्री का चहेता अधिकारी हो या उस क्षेत्र का जनता द्वारा चुना हुआ जनप्रतिनिधि? सवाल तो कई हैं लेकिन जवाब एक ही है – सिस्टम में भ्रष्टाचार बढ़ाने में जुगाड़ से एक ही जगह पर लम्बे समय तक टिके रहने वाले अधिकारियों का सबसे बड़ा योगदान है।
अब हाईकोर्ट के डंडे के बाद भी सवाल जिंदा है – क्या यह जुगाड़ू सिस्टम सुधरेगा, या अगली दो मौतों का इंतजार करेगा?































