(संस्मरणात्मक-साहित्यिक आलेख)
ललिता कापड़ी, हल्द्वानी
प्रेमचंद को पढ़ना मेरे लिए कभी केवल किसी लेखक को पढ़ना नहीं रहा। उनकी कहानियों और उपन्यासों के पन्नों से गुजरते हुए मुझे हमेशा ऐसा लगा है जैसे मैं किसी किताब को नहीं, बल्कि अपने आसपास बिखरी हुई जिंदगी को पढ़ रही हूँ। फर्क केवल इतना था कि जिसे हम रोज़मर्रा में देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, प्रेमचंद उसे शब्द देते थे।
मैंने प्रेमचंद के ‘गबन’, ‘गोदान’, ‘पूस की रात’, ‘ईदगाह’, ‘नमक का दरोगा’, ‘दो बैलों की कथा’ और ‘कफन’ जैसी रचनाएँ पढ़ीं। विशेषकर जब मैं गबन और गोदान पढ़ रही थी, तब कई बार ऐसा हुआ कि किसी दूसरे काम में मन ही नहीं लगा। हर पन्ना पढ़ने के बाद अगले पन्ने को पलटने की जल्दी रहती थी। भीतर एक जिज्ञासा बनी रहती—अब क्या होगा? कौन-सा जीवन-सत्य सामने आएगा? कौन-सा चरित्र अपनी अगली परत खोलेगा?
लेकिन प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल कहानी आगे बढ़ाने की उत्सुकता नहीं जगाते थे, वे पाठक को अपने भीतर उतरने के लिए विवश करते थे।
उनके शब्द पढ़ते हुए जो रेखाचित्र मेरे मन में बनते थे, वे आज भी वैसे ही जीवित हैं। होरी हो, धनिया हो, हल्कू हो, हामिद हो या दो बैलों का हीरा-मोती—ये मेरे लिए केवल किताबों के पात्र नहीं रहे। वे अपने समय से निकलकर मेरे अनुभवों का हिस्सा बन गए।
‘दो बैलों की कथा’, ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ मैंने न जाने कितनी बार पढ़ी और पढ़ाई भी। आश्चर्य यह है कि बार-बार पढ़ने के बावजूद इन रचनाओं के प्रति उत्साह कभी कम नहीं हुआ। हर बार कोई नया अर्थ सामने आया, कोई नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ और किसी पुराने पात्र का कोई नया पक्ष दिखाई दिया।
शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रेमचंद की लेखनी में बनावटीपन नहीं है। वहाँ बेहतर दिखने की कोई लालसा नहीं है। न शब्दों का अनावश्यक आडंबर, न भावुकता का प्रदर्शन और न ही समाज की कुरूप सच्चाइयों से बच निकलने का प्रयास।
वे जीवन को जैसा देखते थे, उसे वैसा ही लिखने का साहस रखते थे।
उनकी लेखनी में किसी प्रकार का भय नहीं था—न सत्ता का, न सामाजिक रूढ़ियों का और न ही उस समय की स्थापित मानसिकताओं का। उन्होंने समाज के उन हिस्सों को साहित्य में जगह दी, जिन्हें अक्सर समाज स्वयं हाशिये पर छोड़ देता था। किसान, मजदूर, स्त्री, गरीब, शोषित, वंचित—उनकी दुनिया के ये पात्र साहित्य के केंद्र में आए तो इसलिए नहीं कि प्रेमचंद उन्हें महान बनाकर प्रस्तुत करना चाहते थे, बल्कि इसलिए कि वे उनके जीवन की वास्तविकता थे।
यही प्रेमचंद की सबसे बड़ी ताकत है।
गाथाएँ लिखना शायद आसान हो सकता है, लेकिन वास्तविकताएँ लिखना कठिन होता है।
गाथा में हम नायक चुन सकते हैं, घटनाओं को भव्य बना सकते हैं और जीवन को अपनी सुविधा के अनुसार सुंदर रूप दे सकते हैं। लेकिन वास्तविकता को लिखते समय लेखक को समाज के सामने आईना रखना पड़ता है। और आईना हमेशा सुंदर चेहरा नहीं दिखाता।
प्रेमचंद ने वही आईना हमारे सामने रखा।
उनके पात्र आदर्श नहीं हैं; वे मनुष्य हैं। उनमें इच्छाएँ हैं, कमजोरियाँ हैं, संघर्ष हैं, स्वार्थ हैं, करुणा है, विवशता है और कहीं-कहीं अपने समय से लड़ने का साहस भी। यही कारण है कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी हमें अपना लगता है।
गोदान का होरी केवल एक किसान नहीं है। उसके भीतर भारतीय किसान की पीड़ा, उसकी आकांक्षाएँ, उसकी सामाजिक विवशताएँ और व्यवस्था के सामने उसकी असहायता दिखाई देती है। निर्मला की त्रासदी केवल एक स्त्री की कहानी नहीं रह जाती। सेवासदन केवल एक जीवन की कथा नहीं, बल्कि स्त्री की सामाजिक स्थिति पर उठाया गया प्रश्न बन जाता है।
और कफन—वह तो पाठक के सामने केवल गरीबी नहीं रखता, बल्कि गरीबी और सामाजिक व्यवस्था के उस भयावह संबंध पर प्रश्न खड़ा करता है, जहाँ लगातार अभाव मनुष्य की संवेदनाओं को भी बदल देता है।
यही कारण है कि प्रेमचंद को पढ़ते हुए मैं कई बार कहानी समाप्त होने के बाद भी कहानी से बाहर नहीं आ पाती।
कहानी खत्म हो जाती है,
लेकिन प्रश्न खत्म नहीं होते।
शायद प्रेमचंद की लेखनी की यही सबसे बड़ी सफलता है।
मैंने जब हरिशंकर परसाई जी का ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ पढ़ा, तब मुझे लगा कि प्रेमचंद को देखने के लिए मेरी दृष्टि में एक और खिड़की खुल गई है। प्रेमचंद की तस्वीर में दिखाई देने वाले वे पुराने जूते केवल उनके व्यक्तिगत अभाव का संकेत नहीं लगते; वे उस लेखक की पूरी जीवन-दृष्टि का प्रतीक बन जाते हैं, जिसने साहित्य को आराम की कुर्सी पर बैठकर नहीं, बल्कि जीवन की धूल भरी राहों के बीच खड़े होकर देखा था।
प्रेमचंद आर्थिक रूप से शायद बहुत समृद्ध नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने अपने भीतर और अपने साहित्य में एक ऐसी संपदा अर्जित की, जिसकी कीमत समय भी नहीं चुका सकता।
वे धन के अर्थ में समृद्ध नहीं थे,
लेकिन अनुभव, संवेदना और साहित्य की दृष्टि से असाधारण रूप से समृद्ध थे।
उनकी सादगी उनके व्यक्तित्व की कमजोरी नहीं थी; वही उनकी शक्ति थी। वे साहित्य को जीवन से अलग करके नहीं देखते थे। उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन नहीं था। वह समाज को देखने, समझने और आवश्यक होने पर उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करने का माध्यम था।
प्रेमचंद को पढ़ाते हुए मुझे अक्सर एक अजीब-सी अनुभूति होती रही है।
जब मैं विद्यार्थियों को उनकी कहानी या उपन्यास पढ़ाती थी, तब लगता था कि मैं उन्हें केवल पाठ नहीं पढ़ा रही—मैं उन्हें मनुष्य को पढ़ना सिखा रही हूँ।
ईदगाह पढ़ाते हुए हामिद के भीतर की संवेदना दिखाई देती है।
पूस की रात पढ़ाते हुए हल्कू की विवशता सामने आती है।
दो बैलों की कथा पढ़ाते हुए मनुष्य और पशु के बीच की संवेदना पर सोचने का अवसर मिलता है।
और गोदान पढ़ाते हुए लगता है कि पूरा समाज हमारे सामने धीरे-धीरे खुल रहा है।
लेकिन हर बार पाठ समाप्त होने के बाद मेरे भीतर एक ही अनुभूति बची रहती—
कुछ छूट गया।
जैसे प्रेमचंद के शब्दों के बीच कोई ऐसा अर्थ था, जिसे मैं अभी पूरी तरह पढ़ नहीं पाई।
आज भी जब प्रेमचंद की कोई रचना पढ़ती या पढ़ाती हूँ, तो यही लगता है कि मैं किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि किसी अनकही बात की तलाश में पढ़ रही हूँ।
शायद यही महान साहित्य की पहचान है।
वह हमें अपने उत्तर नहीं देता;
वह हमारे भीतर नए प्रश्न पैदा करता है।
प्रेमचंद की लेखनी ने मुझे यही सिखाया कि साहित्य का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल सुंदर शब्दों की रचना करना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज की सच्चाई को इतनी ईमानदारी से सामने रखना है कि पाठक स्वयं से प्रश्न करने लगे।
और शायद इसी कारण, इतने वर्षों बाद भी प्रेमचंद मेरे लिए केवल पाठ्यक्रम का लेखक नहीं हैं।
वे उस समाज के साक्षी हैं, जिसे उन्होंने जिया।
वे उन लोगों की आवाज हैं, जिन्हें बोलने का अवसर कम मिला।
वे उस समय के इतिहासकार हैं, जिसे उन्होंने सरकारी दस्तावेजों में नहीं, मनुष्यों के जीवन में पढ़ा।
और मेरे लिए—
प्रेमचंद को पढ़ना आज भी किसी कहानी को पढ़ना नहीं,
बल्कि अपने समय, अपने समाज और अंततः स्वयं को पढ़ना है।
शायद इसीलिए हर बार उनकी किताब बंद करने के बाद भी मन कहता है—
“अभी कुछ और पढ़ना बाकी है…”































