जब कलम दरबारी बन जाए तो खबर नहीं, फरमान छपता है
हल्द्वानी। कभी कहा जाता था – पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। अब हालात ये हैं कि चौथा स्तंभ ही सबसे पहले नीलाम हो रहा है। पत्रकारिता और पत्रकार – कहने को दो शब्द, लेकिन आजकल दोनों ही एक ही थैली के चट्टे-बट्टे बन गए हैं। पहले लोग लिखते थे तो उसे पत्रकारिता कहते थे, क्योंकि कलम में धार थी। आज लोग लिखते हैं तो उसे चाटुकारिता कहा जाता है, क्योंकि कलम में धार नहीं, सरकार का तेल लगा है। और इसमें गलत भी क्या है? भला कहें भी क्यों न! आज बड़े-बड़े मीडिया घरानों पर किसका नियंत्रण है, ये बच्चा-बच्चा जानता है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस और जिसका पैसा, उसकी खबर वाला खेल खुलेआम चल रहा है। सरकार जो चाहती है, वही प्राइम टाइम बनता है, वही हेडलाइन बनती है। हर कोई जानता है कि अमुक चैनल किसकी गोद में बैठा है और अमुक अखबार किस दल की थाली का बैंगन है।

यही ठप्पा अब पत्रकारों पर भी साफ-साफ दिखने लगा है। कोई भगवा गमछे वाला, कोई हरे झंडे वाला, कोई हाथ वाले खेमे का। सबके माथे पर अदृश्य ठप्पा लगा है – यह पत्रकार नहीं, फलां पार्टी का प्रचारक है। समाज भी अब खूब समझदार हो गया है। मुंह पर आते हैं तो कहते हैं – वाह गुरुजी, क्या खबर लिखी है! और पीठ पीछे होते ही शुरू हो जाता है – अरे छोड़ो, ये तो ठप्पे वाला है, ये तो उसका आदमी है। यानी मुंह में राम, बगल में छुरी वाला हिसाब नहीं, अब तो मुंह पर तारीफ, पीठ पीछे ठप्पे की चर्चा वाला नया मुहावरा चल निकला है।
और मजे की बात – इन ठप्पे वाले पत्रकारों को खुद खबर नहीं कि नौकरशाह इन्हें कैसे नचा रहे हैं। साहब लोग भी अब इन्हें बखूबी पहचानने लगे हैं। कुछ अफसर तो इनसे कन्नी काटते हैं, कि कहीं ठप्पा उन पर न लग जाए। और कुछ तो बड़े शातिर हैं – इन्हीं भांडों से पूरा खेला करवा लेते हैं। फाइल निकलवानी हो, ट्रांसफर रुकवाना हो, ठेका दिलवाना हो – तो ठप्पे वाले पत्रकार को आगे कर दो। और बेचारा पत्रकार समझता है कि उसकी पहुंच है, जबकि हकीकत में उसकी कलम गिरवी रखी जा चुकी होती है।
कभी पत्रकारिता का काम था – सत्ता से सवाल पूछना, विपक्ष के साथ नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना। आज उल्टा हो गया है – जिसकी सत्ता, उसी के गुणगान में मीडिया व्यस्त है। सुबह से शाम तक वही भजन, वही आरती। माना कि बिना विज्ञापन के अखबार नहीं चलता, चैनल नहीं चलता। लेकिन विज्ञापन लेना एक बात है और खुद को ही विज्ञापन बना देना दूसरी बात। आज कईयों ने तो अपना जमीर ही नहीं, अपना धंधा-ईमान सब विज्ञापन की रेट लिस्ट में जोड़ दिया है। प्रदेश में यही सबसे बड़ा संकट है – पत्रकार घट रहे हैं, चाटुकार बढ़ रहे हैं। कौओं की संख्या बढ़ी तो कोयल की आवाज दब गई। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने चंद नौकरशाहों की दलाली को ही पत्रकारिता समझ लिया है। जनसरोकार, जनमुद्दे, गांव, गरीब, अस्पताल, स्कूल – इनसे उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। उनके लिए खबर का मतलब है – साहब खुश, तो जेब खुश। याद रखना चाहिए – जब पत्रकारिता चाटुकारिता बन जाती है तो सबसे पहले सत्य मरता है, फिर समाज। और आज प्रदेश में सत्य का ही सौदा चल रहा है, खुलेआम, ठप्पे के साथ।



































