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संत राजिन्दर सिंह जी महाराज के काशीपुर में सत्संग के दौरान हजारों की संख्या में उमड़ा जनसमूह

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काशीपुर। 23 अक्टूबर शुक्रवार को काशीपुर के गढ़ी नेकी रोड़ पर कुंडा चैराहा के निकट कृपाल आश्रम में विश्व-प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु संत राजिन्दर सिंह जी महाराज के सत्संग को सुनने के लिए हजारों की संख्या में जनसैलाब उमड़ पड़ा। आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व रखने वाले काशीपुर शहर में इस पावन अवसर पर भारत और विदेशों से आए हजारों भाई-बहनों के एकत्रित होने से एक दिव्य और उत्साहपूर्ण वातावरण छा गया। सबसे पहले काशीपुर के मेयर दीपक बाली ने संत राजिन्दर सिंह जी महाराज का फूलों के गुलदस्ते देकर स्वागत कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में आदरणीया माता रीटा जी ने संत सूरदास जी की वाणी से एक भजन ”प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरौ” (हे प्रभु! आप मेरे अवगुणों की ओर ध्यान न दें) का गायन किया।

तत्पश्चात संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने अपनी हृदयस्पर्शी तथा प्रभावशाली वाणी में कहा कि हम सब प्रभु के ही बच्चे हैं लेकिन उनसे दूर होने और इस माया की दुनिया की दलदल में धंसे होने के कारण हमारे अंदर कई प्रकार के विकार आ गए हैं। जिस करके हम अनेक अवगुणों और गलतियों से भर गए हैं। यहां इस शब्द में प्रार्थना की जा रही है कि हे प्रभु! आप सबको एक ही नजर से देखते हो। इसलिए आप मेरे अवगुणों की ओर ध्यान न देते हुए अपनी दयामेहर से मुझे इस भवसागर से पार कीजिये क्योंकि मैं आप ही की अंश हूं।

महाराज जी ने आगे ने फ़रमाया कि जिस तरह एक गंदा नाला नदी में मिलकर नदी का रूप बन जाता है, ठीक उसी तरह आप मेरी आत्मा जोकि मन-माया के परदों से गंदी हो चुकी है, उसे आप अपने आपमें मिलाकर अपना रूप बना लीजिये। संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने बाहरी दुनिया का उदाहरण देते हुए अपने सत्संग में समझाया कि एक लोहा जिसकी सब लोग शनि के रूप में पूजा करते हैं और एक लोहा वो है, जिससे कसाई पशुओं को काटता है लेकिन जब पारस का पत्थर इन दोनों प्रकार के लोहों को छूता है तो उन्हें सोना बना देता है। इसी तरह हे प्रभु! आप मेरे अवगुणों की ओर ध्यान न देते हुए मुझे अपने जैसा बना लीजिये।
सत्संग के अंत में उन्होंने कहा कि 84 लाख योनियों में मानव चोला ही सर्वोत्तम है, जिसमें हम अपने आपको जान सकते हैं और प्रभु को पा सकते हैं। इस शरीर को हरि-मंदिर कहा गया है क्योंकि इस शरीर में हमारी आत्मा भी बस रही है और परमात्मा भी बस रहा है। माया के जाल में फँस कर हमारी आत्मा गंदगी से भरपूर हो गई है। जब तक यह प्रभु के शब्द के साथ नहीं जुड़ेगी, तब तक यह पवित्र नहीं हो सकती। इसलिए हे प्रभु! आप मुझे इस माया के जाल से छुटकारा दिलाकर मुझे इस भवसागर से पार उतारिये ताकि आपने जो मुझसे वादा किया था, वो पूरा हो और मेरी आत्मा सचखंड में जाकर आपमें हमेशा-हमेशा के लिए लीन हो जाए। उनके प्रवचन को सुनने के लिए सिर्फ काशीपुर और भारत के विभिन्न राज्यों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी भाई-बहन आए हुए थे। सत्संग के उपरांत संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने कई नए जिज्ञासु भाई-बहनों को प्रभु की ज्योति और श्रुति का अनुभव देते हुए आध्यात्मिक दीक्षा प्रदान की।
काशीपुर के सत्संग कार्यक्रम के दौरान रक्तदान शिविर और जरूरतमंद भाई-बहनों के लिए मुफ्त वस्त्र-वितरण शिविर का भी आयोजन किया गया। संत राजिन्दर सिंह जी महाराज, भीतर के ईश्वरीय प्रकाश पर ध्यान-अभ्यास के माध्यम से आंतरिक और बाहरी शांति को बढ़ावा देने के अपने कार्यों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं। एक विश्व-विख्यात ध्यान-अभ्यास के शिक्षक और ध्यान-अभ्यास पर सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तकों के लेखक के रूप में, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज पिछले 37 वर्षों से संपूर्ण विश्व में शांति, प्रेम और मानव एकता का संदेश फैला रहे हैं। सावन कृपाल रूहानी मिशन के आज संपूर्ण विश्वभर में 3500 से ज्यादा केन्द्र स्थापित हैं। मिशन का मुख्यालय विजय नगर, दिल्ली (भारत) और नेपरविले, शिकागो (अमेरिका) में स्थित हैं।