दया भट्ट ‘दया’
विजयादशमी हर वर्ष रावण जलता है, आसमान आतिशबाज़ियों से भर जाता है, लोग जयघोष करते हैं, और हम विजयादशमी मना लेते हैं।
लेकिन… जब उत्सव की रोशनी बुझ जाती है, तो एक प्रश्न मेरे भीतर जागता है— क्या सचमुच रावण मर गया?
या वह अब भी जीवित है हमारे भीतर, हमारे अहंकार में, हमारी कटु वाणी में, हमारी ईर्ष्या में, हमारे छल में, और उस स्वार्थ में, जो हमें दूसरों का दर्द देखने नहीं देता।
हम रावण के दस सिर जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर पलते विकारों को छूने से भी डरते हैं।
हम चाहते हैं कि संसार बदल जाए, लोगों का व्यवहार बदल जाए, रिश्तों में मिठास आ जाए, हर ओर प्रेम और सद्भाव हो— लेकिन शुरुआत कोई और करे!
आखिर क्यों?
क्यों नहीं हम स्वयं से शुरुआत करें? क्यों नहीं अपने क्रोध को धैर्य की अग्नि में तपाएँ? अपने अहंकार को विनम्रता से पराजित करें? अपनी ईर्ष्या को दूसरों की सफलता पर प्रसन्न होकर मिटाएँ?
क्यों नहीं अपनी वाणी को ऐसा बनाएँ कि उससे किसी का हृदय न टूटे, अपने हाथों को ऐसा बनाएँ कि वे किसी का सहारा बन सकें, और अपने विचारों को इतना निर्मल करें कि किसी के प्रति घृणा ठहर न सके।
पर याद रहे, बुराई पर विजय का अर्थ अन्याय के सामने झुक जाना नहीं, क्षमा का अर्थ बार-बार अपमान सहना नहीं, और विनम्रता का अर्थ अपने आत्मसम्मान को खो देना नहीं।
राम होना केवल धनुष उठाकर युद्ध करना नहीं, राम होना है— सत्य के साथ खड़े रहना, शक्ति होते हुए भी मर्यादा निभाना, और विजय मिलने पर भी विनम्र बने रहना।
मैं चाहती हूँ, इस बार एक रावण बाहर जले और एक मेरे भीतर।
बाहर का रावण अग्नि की लपटों में समाप्त हो जाए, और भीतर का रावण मेरे आत्मचिंतन से पराजित हो।
मैं अपने दोषों को पहचानूँ, अपनी भूलों को स्वीकार करूँ, जहाँ संभव हो, क्षमा माँगूँ, जहाँ उचित हो, क्षमा करूँ, और जहाँ किसी के काम आ सकूँ, वहाँ बिना किसी अपेक्षा के अपना हाथ आगे बढ़ाऊँ।
क्योंकि मेरे लिए विजयादशमी केवल एक पर्व नहीं, स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है।
रावण का पुतला जलाना परंपरा है, अपने भीतर की बुराई जलाना साधना है।
जब मन से अहंकार घटेगा, व्यवहार में करुणा बढ़ेगी, वाणी में सत्य और मिठास होगी, और कर्मों में मानवता दिखाई देगी, तभी विजयादशमी का अर्थ हमारे जीवन में साकार होगा।
आइए, इस बार केवल विजय का उत्सव न मनाएँ, विजय के योग्य बनने का संकल्प भी लें।
क्योंकि—सच्ची विजय वह नहीं, जिसमें हम किसी और को हरा दें; सच्ची विजय वह है, जिसमें हम अपने भीतर की बुराई को हराकर एक बेहतर मनुष्य बन जाएँ।



































