उत्तराखंड में गुटखा, पान मसाला पर एक साल के बैन का जमीनी असर सरकारी दावे से अलग दिख रहा है। सरकार ने जनस्वास्थ्य के नाम पर बैन लगाया, लेकिन इससे खजाने को 40 करोड़ के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि बाजार में गुटखा ब्लैक में दोगुने दाम पर बिक रहा है।
राजस्व का हिसाब : 40 करोड़ की चोट
गुटखा-पान मसाला से हर साल सरकार को करीब 100 करोड़ के बाजार से 40 करोड़ का GST मिलता था, जिसमें राज्य का हिस्सा सीधा 20 करोड़ था। सरकार का तर्क है कि 3.82 लाख करोड़ का GSDP के सामने 40 करोड़ महज 0.01 प्रतिशत है, लेकिन कर्ज में डूबे राज्य के लिए हर करोड़ अहम है।
पहले भी फेल हो चुका है फॉर्मूला
यह पहला मौका नहीं है। 2011-12 में भी सरकार ने गुटखा पर प्रतिबंध लगाया था। तब कंपनियों ने नया तोड़ निकाल दिया – पान मसाला अलग और जर्दा अलग पाउच में बेचना शुरू कर दिया। ग्राहक दोनों को मिलाकर खुद गुटखा बना लेता था। नतीजा, बैन कागजों में रह गया था।
विक्रेता मालामाल, सरकार कंगाल
प्रदेश में बैन के बाद भी हालात जस के तस हैं। 5 रुपये में मिलने वाला गुटखा अब 8 से 15 रुपये में बिक रहा है। 10 रुपये की तंबाकू की पुड़िया 20 से 25 रुपये में मिल रही है। यूपी और दिल्ली से तस्करी तेज हो गई है। दुकानदार चोरी-छुपे बेच ही रहे हैं। यानी सरकार की खजाने का नुकसान, काला बाजारी की चांदी।
सेलिब्रिटी कर रहे खुलेआम प्रचार
एक तरफ सरकार बैन लगा रही है, दूसरी तरफ बड़े पर्दे के सितारे पान मसाला के नाम पर गुटखा का प्रचार कर रहे हैं। अक्षय कुमार, अजय देवगन, शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन जैसे आइकन के होर्डिंग्स हर हाईवे और जुएं पर दिख रहे हैं, जो युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। सवाल है, इन विज्ञापनों पर रोक क्यों नहीं? सरकार ने तो तंबाकू जागरूकता अभियान चलाया, न ही अवैध बिक्री पर कड़ा कानून बनाया। सिर्फ एक नोटिफिकेशन से क्या जुबां गुटखा छूटेगी?
फिलहाल 40 करोड़ गंवाकर सरकार ने कालाबाजारी के लिए नया बाजार खोल दिया है और युवा अब भी कह रहे हैं – जुबां केसरी।
शराब पर कब लगेगा प्रतिबंध?
गुटखा बैन के बाद सोशल मीडिया पर उठा सवाल
उत्तराखंड में गुटखा-पान मसाला पर एक साल के प्रतिबंध के बाद सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। लोग सवाल कर रहे हैं – जब सेहत के नाम पर गुटखा बैन हो सकता है, तो शराब पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगेगा? फेसबुक, एक्स और वॉट्सएप पर यूजर्स लगातार कमेंट कर रहे हैं कि गुटखा तो गली-गली में चोरी-छुपे बिक रहा है, लेकिन शराब तो सरकार खुद ठेकों पर खुले आम बेच रही है। लोगों के 3 बड़े सवाल –
1. सेहत का पैमाना दोहरा क्यों?
यूजर्स कह रहे हैं कि सरकार ने कहा गुटखा से कैंसर होता है इसलिए बैन किया। तो शराब से लीवर खराब, एक्सीडेंट और घरेलू हिंसा होती है, तो उस पर बैन क्यों नहीं?
2. राजस्व का खेल?
एक यूजर ने लिखा – गुटखा से 40 करोड़ का राजस्व था, छोड़ दिया। शराब से 4000 करोड़ से ज्यादा का राजस्व आता है, इसलिए नहीं छोड़ेंगे। लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार को सेहत से ज्यादा राजस्व की चिंता है।
3. उत्तराखंड में शराब क्यों?
उत्तराखंड में देवभूमि कहा जाता है। चारधाम यात्रा मार्गों, हरिद्वार-ऋषिकेश जैसे धार्मिक शहरों में भी शराब की दुकानें खुली हैं। लोग मांग कर रहे हैं कि कम से कम धार्मिक स्थलों के आसपास तो पूर्ण शराबबंदी हो। गौरतलब है कि उत्तराखंड में शराब सरकार की कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। हर साल आबकारी से 4000 करोड़ से अधिक राजस्व मिलता है। यही वजह है कि सरकार गुटखा पर तो तुरंत बैन लगा देती है, लेकिन शराबबंदी पर चुप्पी साध लेती है।


































