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झंडा…सॉरी डंडा ऊंचा रहे हमारा!

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राजेंद्र शर्मा

देखी, देखी, इन कॉकरोचों की बदमाशी देखी! मोदी जी-शाह जी को छकाने के इरादे से, रोज-रोज नये-नये नारे लगा रहे हैं, रोज-रोज नयी-नयी मांगें उठा रहे हैं। जंतर मंतर-1.0 को छोड़ भी दें तब भी, जंतर मंतर-2.0 में ही अब तक तीन-तीन मांगें बदल चुके हैं। पहले बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे, नहीं तो हम जंतर मंतर-2.0 करेंगे। शाह जी ने भी कहा कि जंतर मंतर-2.0 तो तब होगा, जब जंतर मंतर रहेगा। उनके मंत्रालय ने मंतर पढ़ा और जंतर मंतर छूमंतर कर दिया। पर छूमंतर होने की जगह कॉकरोच अपनी मांग से पलट गए और लगे जंतर मंतर वापस करो की मांग करने। नारे लगाने लगे – जंतर मंतर हम आएंगे, तुझे पब्लिक को लौटाएंगे। और जब चोरी छिपे दीवार फांदकर जंतर मंतर को खोजने पहुंचे पांच-दस कॉकरोचों को शाह जी की पुलिस ने जेल भेज दिया, तो कॉकरोच पट्ठे फिर पलट गए। कहने लगे, हमें तो तिरंगा फहराना है। हम तिरंगा लेकर आएंगे, कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में फहराएंगे!

खैर, शाह जी चाणक्य ठहरे, कॉकरोचों की इन पलटियों के धोखे में आने वालों में थोड़े ही थे। जो फौज-फर्रा पहले कॉकरोचों को जंतर-मंतर के आस-पास भी फटकने नहीं देने के लिए लगाया था, उसे अब तिरंगा फहराने से रोकने की ड्यूटी पर लगा दिया। कनॉट प्लेस को तिरंगा-मुक्त कराने का ऐलान कर दिया — जो तिरंगा फहराने आएगा, सीधा जेल जाएगा। यह दूसरी बात है कि कनॉट प्लेस की तिरंगा मुक्ति भी उससे कई-कई किलोमीटर दूर तक काम कर रही थी। दीपके को उसके घर से बाहर कदम रखते ही पुलिस ने धर लिया और नेहा बोरा को, कनॉट प्लेस से तीन किलोमीटर दूर मंडी हाउस से। बेशक, कई कॉकरोच कनॉट प्लेस तक पहुंचने के लिए भी धरे गए।

विरोधियों ने बस इत्ती सी बात पर तिल का ताड़ बना दिया। शोर मचा रहे हैं कि मोदी-शाह के राज में तो तिरंगा फहराना भी जुर्म हो गया। सिर्फ तिरंगा फहराने के लिए लोगों को शाह जी की पुलिस गिरफ्तार कर रही है। राहुल एंड कंपनी ने इसमें भी अपना नफरत बनाम मोहब्बत का फलसफा और घुसा दिया — कॉकरोचों से नफरत करते-करते ये तो तिरंगे से भी नफरत करने लगे। हम तिरंगे से अपनी मोहब्बत और बढ़ाएंगे। तिरंगे के लिए अंग्रेजों के डंडे खाए थे, क्या हम शाह की पुलिस के डंडों से डर जाएंगे — हम तिरंगा वहीं फहराएंगे!

विरोधियों का अंग्रेजों के टैम की बात बीच में लाना बेशक, सरासर चीटिंग है। माना कि मोदी जी-शाह जी के संघ वाले पुरखे अंग्रेजों के जमाने में तिरंगे के लिए कभी नहीं पिटे थे, लेकिन इससे उनका तब तिरंगे के खिलाफ होना कहां साबित होता है। इसी तरह, माना कि आज शाह जी कनॉट प्लेस को तिरंगा मुक्त करा रहे हैं, लेकिन इससे संघ की आज की पीढ़ी का तिरंगे से नफरत करना कहां साबित होता है? जो मंदिर वहीं बनाएंगे का विरोध करते हुए भी कहते थे कि वे मंदिर के खिलाफ नहीं हैं, अब किस मुंह से तिरंगा वहीं फहराएंगे के विरोध को, तिरंगे का विरोध बता रहे हैं?

रही तिरंगे से प्रेम की बात तो जिन मोदी जी ने इसी पंद्रह अगस्त से पहले, घर-घर तिरंगा फहरवाया था, उनके तिरंगा प्रेम पर कोई सवाल उठा ही कैसे सकता है? क्या हुआ कि जब तिरंगे को राष्ट्र ध्वज बनाया गया था, तब संघ ने उसका अशुभ कहकर विरोध किया था ; क्या हुआ कि संघ ने नागपुर में अपने कार्यालय पर पचपन साल तक तिरंगा नहीं फहराने दिया था ; अब तो हर-हर मोदी के बाद, घर-घर तिरंगा कर के उन्होंने सारी कसर पूरी कर दी है। फिर, एक कनॉट प्लेस में तिरंगा फहराने के लिए गिरफ्तारियों के लिए, मोदी राज पर तिरंगे से नफरत की तोहमत लगा सकते हैं क्या?

वैसे भी कॉकरोच कनॉट प्लेस में तिरंगा झोलों में रखकर, शरीर पर लपेट कर और न जाने कैसे-कैसे छुपा कर ले जा रहे हैं। ऐसे धोखे से, झंडा फहराने को भी झंडा फहराना कह सकते हैं क्या? बिना डंडे के तिरंगा फहराने का भी क्या फायदा? ऐसे झंडे से तो पुलिस का डंडा ही अच्छा। ज्ञानेश कुमार से लेकर रिजीम तक के चेंज की हवाओं को रोकता तो है। झंडा, सॉरी डंडा ऊंचा रहे हमारा!

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं।)