दया भट्ट दया, उत्तराखंड
आज विदा के दिन, हे पितरों,
नयनों में जलधार लिए,
मन के पावन आँगन में हम,
बैठे आपका प्यार लिए।
जिनसे जीवन, जिनसे संस्कार,
जिनसे मिली हमें पहचान,
जिनकी छाया में सीखा था,
कैसे बनता है इंसान।
उनकी पावन स्मृतियों का,
मन में मधुर संसार लिए,
आज खड़े हैं द्वार तुम्हारे,
श्रद्धा का उपहार लिए।
जिन हाथों ने हमें सँवारा,
जिनसे पाया नेह-दुलार,
जिनकी सीख बनी जीवन में,
हर मुश्किल में खेवनहार।
उनकी मीठी यादों का हम,
मन में पावन सार लिए,
बैठे हैं चरणों में अपने,
आँखों में सत्कार लिए।
तर्पण के जल में बहती हैं,
मन की भावुक धाराएँ,
दीप जलाकर आज बुलाएँ,
बचपन की मधुर कथाएँ।
भीगी पलकों में सहेजे,
अनगिन सपने साकार लिए,
आज खड़े हैं द्वार तुम्हारे,
मन में अटूट प्यार लिए।
आप नहीं हो पास हमारे,
फिर भी मन के पास रहे,
आप दिए संस्कारों से ही,
जीवन में विश्वास रहे।
आपकी अमर धरोहर का,
हृदय में उजला भार लिए,
हम चलते हैं राह तुम्हारी,
श्रद्धा का आधार लिए।
आज विदा के दिन, हे पितरों,
नयनों में जलधार लिए,
मन के पावन आँगन में हम,
बैठे आपका प्यार लिए।
आप जहाँ भी हों, हे पितरों,
सुख-शांति का वास रहे,
वंश-वृक्ष की हर शाखा पर,
आपका आशीर्वाद रहे।



































