ठहर कर देखो ज़रा युवा कवियित्री ललिता जी के आलेख संग्रह के प्रकाशन पर गर्व महसूस होता है। यह संग्रह पाठकों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाएगा, यह निश्चित है। यह रचना साहित्य जगत की बहती गंगा में एक विशेष प्रवाह बनेगा। जब भी कुछ सार्थक और कहने योग्य बातों पर विचार करते हैं तो एक नए सृजन की एक पृष्ठभूमि होती है। इस गद्य संग्रह को पढ़ने वाले पाठक को लगे कि मैने एक सार्थक कार्य किया है यही इस रचना की उपादेयता है। कुछ भावनाएं ललिता जी के अंतश में उठी और इस ठहर कर देखो ज़रा नामक विधा के रूप में साकार हो गई । बहुत सारगर्भित बात लिखी है लेखिका ने कि
जीवन भागने के लिए नहीं,समझने के लिए मिला है। जब हम ठहरते हैं तभी खुद को पहचान पाते है
और खुद कौन है इससे हम कभी मिलते ही नहीं हैं जबकि यह ईश्वर की बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति है, अर्थात खुद हमारे जीवन का सबसे अहम हिस्सा है,उससे ठहर कर मिलने का कह कर लेखिका एक अवसर दे रही है कि खुद को समझो कि खुद हो तो ही संसार है, वरना…………
सफ़लता की दौड़ में अगर खुद को खो दिया तो मंज़िल भी अधूरी रह जाती है। ठहर कर देखिए जरा,आपको जीवन का सौंदर्य दिखाई देगा।
विशेषतः ईश्वर से साक्षात्कार हो ही गया आखिर, एक अच्छी किताब दस अच्छे मित्रों से भी ज्यादा होती है। श्राद्ध या फिर श्रद्धा और मृत्यु और अमरता दिल को छू गई। मैं पक्षधर हूं कि यह पुस्तिका नई पीढ़ी और समाज के लिए ज्ञानार्जन का भी मार्ग प्रशस्त करेगी,साथ ही साथ सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए पठनीय और संग्रहणीय होगी। मैं ललिता जी को इस प्रकाशन पर हार्दिक शुभकामनाएं, बधाई और आशीर्वाद देता हूं कि यह साहित्य जो हित सहित है लिख कर सभी का हित किया है। ईश्वर सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रखे। भगवान भास्कर आपके जीवन में प्रत्येक पल को आलोकित करे।
किशोर कुमार बोहरा, एच.196, प्रताप नगर
जोधपुर 342003



































