यूं ही नहीं कहा जाता था – एक तिवारी सब पर भारी। यह नारा नहीं, उत्तराखंड के स्वर्णिम दौर का दस्तावेज था। जब आज के नेता फीता काटने और सोशल मीडिया की रील बनाने में व्यस्त हैं, तो स्व. नारायण दत्त तिवारी जी कुर्सी पर बैठकर इतिहास लिख रहे थे।
विरोधियों के बीच विकास का शिल्पकार
स्व. तिवारी जी के सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ दिल्ली से लेकर देहरादून तक कांग्रेस के भीतर ही उनके विरोधी उनकी कुर्सी खींचने में लगे थे, दूसरी तरफ एक नवजात राज्य, जिसके पास न बजट था, न इंफ्रास्ट्रक्चर, न दिशा। विरोधी कुर्सी गिराने का षड्यंत्र रचते रहे, और तिवारी जी कुर्सी बचाते-बचाते राज्य को बना गए। यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी कला थी।
जो आज दिखता है, वो तिवारी जी का दिया है
आज उत्तराखंड का जो भी मैदानी विकास है, उसकी नींव में एक ही नाम है – एन.डी. तिवारी।
1. सिडकुल क्रांति: 2002 से पहले रुद्रपुर, पंतनगर, सितारगंज सिर्फ नाम थे। तिवारी जी टाटा, बजाज, अशोक लेलैंड, महिंद्रा जैसे सैकड़ों उद्योगपतियों को हाथ पकड़कर लाए।
2. शिक्षा का विस्तार: दून विश्वविद्यालय, उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय, हर जिले में पॉलिटेक्निक – यह सब 2002-2007 के विजन का परिणाम है।
3. स्वास्थ्य: हल्द्वानी का डॉ. सुशीला तिवारी अस्पताल और दून अस्पताल की क्षमता तिवारी जी ने ही बढ़ाई।
4. नगर निगमों की नींव: हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार आदि का शहरीकरण की मुख्यधारा में लाने की सोच उन्होंने ही दी।
आज की राजनीति और आज की सरकार
फर्क साफ है। तिवारी जी उद्योग लाए थे, आज की सरकार पेपर लीक ला रही है। तिवारी जी ने युवाओं को रोजगार दिया, आज की सरकार बेरोजगारों को लाठी और मुकदमे दे रही है। जातिगत भेदभाव के लिए यूजीसी जैसी नीति आज की सरकार ला रही है। आज राजनीति सिर्फ और सिर्फ धर्म-जाति पर आधारित हो गयी है। खैर सब समय का फेर है। अब कुर्सी पाना महज अपने निजी शौक पूरे करने का माध्यम बनकर रह गयी है। यही वजह है कि आज विकास की चिंता छोड़ धर्म और जातिगत राजनीति ही प्रथम प्राथमिकता बन गयी है। विकास से ज्यादा चिंता धर्म और जाति के आधार पर आम जनमानस को बांटकर सत्ता हासिल करना है। तिवारी जी की राजनीति में जनता को रोजगार चाहिए था, आज की राजनीति में जनता को धर्म और जाति के नाम पर बांटा जा रहा है। तिवारी जी ने कुर्सी का इस्तेमाल राज्य बनाने के लिए किया, आज कुर्सी का इस्तेमाल सिर्फ अपने निजी शौक, अपने परिवार और अपने रसूख को बचाने के लिए हो रहा है।
तिवारी जी विरोधियों से लड़कर भी विकास करते रहे, आज की सरकार बहुमत में होकर भी सिर्फ बहानेबाजी कर रही है। सड़कें टूटी हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं, पहाड़ खाली हो रहे हैं। तिवारी जी ने कहा था – “विकास की कोई पार्टी नहीं होती”, आज की राजनीति कहती है – “विकास के बिना भी सत्ता मिलती है, बस धर्म और जाति का तड़का लगना चाहिए।”
इसलिए आज भी उत्तराखंड का हर समझदार आदमी कहता है – उत्तराखंड के इतिहास में दो ही दौर हैं, तिवारी से पहले और तिवारी के बाद, और विकास सिर्फ तिवारी के साथ था।


































