रमेश चन्द्र पाण्डे
उत्तराखंड के इतिहास की सबसे काली रात की 32वीं बरसी। 2 अक्टूबर 1994 की वो रात मैं कभी नहीं भूल सकता। मैं उस दौरान आडिट विभाग, नरेन्द्र नगर में तैनात था। 1 अक्टूबर 1994 की शाम हम नरेन्द्र नगर से दिल्ली में हो रही रैली के लिए रवाना हुए। रात में नारसन के पास हमारी सारी बसों को रोक दिया गया। रातभर आन्दोलनकारियों के साथ क्रूरता की गई और महिलाओं के साथ अभद्रता की गई। चीख-पुकार और दहशत से गुजरी उस काली रात के बाद जब सूर्योदय हुआ तो हम सब इकट्ठा हुए। हजारों की तादाद में इकट्ठा हुए हम लोगों के ठीक सामने एक बड़ी दिवार के रुप में सैकड़ों पुलिस बल के जवान खड़े थे । गांधी जयन्ती के दिन ठीक 8 बजे जब हम सब “रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम…” गा रहे थे तो ठीक उसी समय किसी के द्वारा पुलिस की ओर एक गन्ना और फिर एक चप्पल फेंकी गई, जिसके बाद वहां भगदड़ के साथ गोलीबारी हुई और कई आन्दोलनकारी घायल और शहीद हो गये। इस काण्ड में मैं भी मौत से रूबरू हुआ।
पिछले 10 साल से हर साल इस काण्ड की बरसी पर मैं रामपुर तिराहा स्थित शहीद स्थल जाता रहा हूँ। इस बार माता-पिता के श्राद्ध होने से नहीं जा सका। हल्द्वानी स्थित अपने घर में उस दिन शहीदों की शहादत के परिदृष्य को याद करते हुए मन में एक सवाल उठा कि कुमाऊं से भी तो लोग दिल्ली की रैली में गये थे, तो आखिर वहां ऐसी अप्रिय स्थिति क्यों नहीं हुई? इसी सवाल पर आज मैंने हल्द्वानी में हुई उस दौरान की गतिविधियों से सम्बन्धित फाइलों और अखबारों की कतरनों का अध्ययन किया और कई लोगों से बात भी की।
जिसका निष्कर्ष यह निकला कि कुमाऊं में आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों ने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।
हुआ यह था कि जब दिल्ली कूच के लिए जिला प्रशासन और परिवहन निगम ने बसों के परमिट देने से मना कर दिया, तो हल्द्वानी में छात्र-अभिभावक संघर्ष समिति से जुड़े एन.सी. तिवारी, दीवान सिंह बिष्ट, नवीन चन्द्र वर्मा, भुवन चन्द्र पाण्डे आदि ने 1 अक्टूबर 1994 को ही मुनसिफ मजिस्ट्रेट श्री जे.के. शर्मा की अदालत में वाद दायर कर दिया। अदालत ने वाद संख्या 0717 पर सुनवाई करते हुए दिल्ली रैली हेतु निजी बसों को परमिट देने का आदेश दिया।
कुमाऊं मोटर ऑनर्स यूनियन ने निःशुल्क बसें और पेट्रोल पम्प एसोसिएशन ने निःशुल्क डीजल दिया, और सभी आन्दोलनकारी अदालत के आदेश की प्रति लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए।
यदि कुमाऊं के नेतृत्व ने उस समय अदालत से अनुमति नहीं ली होती, तो कुमाऊं की बसों को भी मुरादाबाद के पास जोया में रोक दिया जाता और जोया में भी मुजफ्फरनगर काण्ड जैसा ही बर्बरतापूर्ण काण्ड हो जाता। क्योंकि शासन का मौखिक आदेश तो एक ही था – “उत्तराखंड वालों को दिल्ली मत जाने दो।”
अदालत के लिखित आदेश के कारण प्रशासन कुमाऊं की बसों को रोकने की हिम्मत नहीं कर पाया। और यही कारण है कि कुमाऊं के आन्दोलनकारी सुरक्षित दिल्ली पहुँच पाए, जबकि बिना अदालती आदेश के गई बसों को मुजफ्फरनगर में रोक कर वह बर्बरता की गई जिसे आज रामपुर तिराहा काण्ड के नाम से जाना जाता है।
आज बरसी पर उन सभी शहीदों को नमन और कुमाऊं के उन बुद्धिमान नेतृत्व को भी सलाम जिन्होंने एक अदालती आदेश से सैकड़ों जानें बचा लीं।
(लेखक उत्तराखंड कार्मिक एकता मंच के संस्थापक अध्यक्ष एवं उत्तराखंड आंदोलनकारी हैं)


































