Home उत्तराखंड भाजपा हाशिये पर, आर.एस.एस. की बंदरबांट

भाजपा हाशिये पर, आर.एस.एस. की बंदरबांट

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2014 के बाद सत्ता पर ‘सौ दिन चोर का, एक दिन साध का’ वाली कहावत चरितार्थ

देहरादून। वर्ष 2014 को देश के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ (टर्निंग प्वाइंट) के तौर पर देखा जा रहा है, जब से सत्ता की बागडोर परोक्ष रूप से नागपुर का ठप्पा लग गया। आरोप है कि तब से ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे’ वाली कहावत सरकारी विभागों में लागू हो गई। सूत्रों की मानें तो हर सरकारी महकमे में जो ‘ऊंची दुकान फीकी पकवान’ जैसा प्रशासन चल रहा है, उसके पीछे एक ही संगठन का हाथ बताया जा रहा है। सरकारी विभाग जो जनता की सेवा के लिए बने थे, वहां ‘अपनी ही बिल्ली और अपना ही खंभा’ वाली स्थिति बन गई है। नियम-कानून को ताक पर रखकर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का खेल खेला जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा अब केवल मुखौटा बनकर रह गई है। ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ वाली बात भाजपा के पुराने कर्मठ कार्यकर्ताओं पर सटीक बैठती है, जो आज हाशिये पर हैं। आरोप है कि ‘कांग्रेस, सपा, बसपा से आए दलबदलुओं को गले लगाकर’ संगठन ने भाजपा को ही भीतर से खोखला कर दिया है, यानि ‘घर का भेदी लंका ढाए’।

उत्तराखंड का हाल तो और भी दिलचस्प है। कहा जा रहा है कि ‘जनता ने नकारा, पर संगठन ने संवारा’ की तर्ज पर फैसले हुए। प्रदेश में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि ‘बंदरबांट में लगे हैं सारे, सरकारी जमीनें बांटे कोड़ियों के भाव’। सबसे बड़ी बात यह है कि इन बेलगाम नौकरशाहों पर हाथ कौन डाले? इनके रसूख का आलम यह है कि ‘एक की पत्नी न्यायाधीश, दूसरे का रिश्तेदार कैबिनेट में आसीन’। यानि ‘सैंया भए कोतवाल तो अब डर काहे का’।

आज हालात ये हैं कि ‘धर्म की दुकान बंद, अब जाति की नई दुकान’ खोल दी गई है। यूजीसी के नाम पर अगड़ा-पिछड़ा को लड़ाकर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई जा रही है।अब सवाल यह है कि ‘सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ वाली छवि कब तक चलेगी? क्या संगठन अपने ही दामन पर लगे इन दागों को धोएगा या ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की तरह यह लूट बदस्तूर जारी रहेगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि ‘ऊंट किस करवट बैठता है’। बहरहाल 2014 के बाद से सत्ता का खेल पूरी तरह बदल गया। आरोप है कि ‘नाम भाजपा का, काम संघ का’ वाली नीति चल रही है। भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ता आज हाशिये पर धकेले जा चुके हैं और ‘आया राम गया राम’ की तर्ज पर दूसरे दलों से आए नेताओं को मलाईदार पद बांटे जा रहे हैं।

कहा जा रहा है कि हर सरकारी विभाग में ‘अपना सिक्का खोटा तो परखैया का क्या दोष’ वाली स्थिति है। सरकारी जमीनें कोड़ियों के भाव अपनों में बांटी जा रही हैं और भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई के बजाय ‘अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपनों को दे’ की कहावत चरितार्थ हो रही है। एक दिन शिकायत और दूसरे दिन प्रमोशन, यही नया दस्तूर बन गया है।

उत्तराखंड में भी यही हाल है। इन बेलगाम नौकरशाहों के हौसले इतने बुलंद हैं कि ‘सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का’। किसी की पत्नी न्यायपालिका में तो किसी का रिश्तेदार कैबिनेट में, यानि पूरा ‘गठजोड़’। अब सवाल है कि यह ‘बंदरबांट’ कब तक चलेगी और संगठन इस पर लगाम लगाएगा या नहीं?