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अंतस की आवाज़ से समाज के सरोकार तक पहुँचता काव्य-संग्रह ‘कुछ दिल ने कहा’

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ललिता कापड़ी, हल्द्वानी उत्तराखंड

कवयित्री – शशि कुड़ियाल ‘चंद्रभा’
समीक्षक – ललिता कापड़ी
प्रकाशक – अविचल प्रकाशन
मूल्य – 350 रूपये मात्र

— साहित्यिक दृष्टि से

कविता मनुष्य के भीतर घटने वाली उस प्रक्रिया का नाम है, जिसमें अनकहे भाव शब्दों का रूप लेते हैं और निजी अनुभूतियाँ धीरे-धीरे सामूहिक संवेदना में बदल जाती हैं। शशि कुड़ियाल ‘चंद्रभा’ का काव्य-संग्रह ‘कुछ दिल ने कहा’ (अंतस के स्वर) इसी आंतरिक संवाद की रचनात्मक अभिव्यक्ति है। यह संग्रह केवल प्रेम, स्मृति अथवा व्यक्तिगत भावुकता का दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते समय, सामाजिक संबंधों, मानवीय मूल्यों, नारी चेतना, प्रकृति, परिवार, वृद्धावस्था, अकेलेपन और जीवन के विविध अनुभवों से लगातार संवाद करता हुआ दिखाई देता है। पुस्तक के आवरण पर भी इसे ‘काव्य-संग्रह’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक की भूमिका और ‘अध्यक्ष की कलम से’ जैसे आरंभिक हिस्से संग्रह की मूल संवेदना को समझने में सहायता करते हैं। यहाँ साहित्य को मनुष्य के हृदय की अनुभूतियों के माध्यम से समाज तक पहुँचने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। लेखिका की रचनात्मक दृष्टि में संवेदना, सामाजिक सरोकार, नारी चेतना, मानवीय मूल्य और जीवन के विविध रंग साथ-साथ उपस्थित हैं।

निजी अनुभूति से सामाजिक संवेदना तक

संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखिका अपने ‘मैं’ को केवल अपने तक सीमित नहीं रखतीं। उनकी अनुभूति जब शब्द बनती है तो उसमें पाठक अपने जीवन का कोई न कोई अंश पहचान लेता है। यही कारण है कि ‘मनुजता आत्मा का श्रृंगार हो’, ‘मैं क्यों लिखती हूँ’, ‘चेहरे और नकाब’, ‘वृद्ध जो कभी तरुण थे’, ‘जीवन की सांझ में नई भोर’, ‘एक गुजारिश’, ‘भीड़ में बस एक इंसान ढूँढती हूँ’, ‘अनकही बातें’ जैसी रचनाएँ अलग-अलग विषयों को छूते हुए भी एक साझा मानवीय धरातल निर्मित करती हैं। रचना-क्रम में इन विषयों का विस्तार स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ लेखिका की दृष्टि जीवन के चमकदार पक्ष तक सीमित नहीं है। वह उन चेहरों को भी देखती हैं जिन्हें सामान्यतः समाज की भीड़ में अनदेखा कर दिया जाता है। ‘फुटपाथ’, ‘सिपाही कलम के’, ‘निर्दोष दोषी’, जैसी रचनाओं के शीर्षक ही संकेत देते हैं कि कवयित्री की संवेदना समाज के हाशिये और जीवन की विडंबनाओं तक पहुँचती है। इस दृष्टि से संग्रह का सामाजिक पक्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

समय के बदलते चेहरे की पहचान

संग्रह में समय एक महत्वपूर्ण पात्र की तरह उपस्थित है। ‘वक्त के साथ बदलते ताज’, ‘चलो न पहले जैसे बन जाएँ’, ‘पहले पाठक बनें’, ‘अगर किताबें न होती’, ‘नजरिए की बात’ और ‘वक्त की करवट’ जैसे शीर्षक बदलते सामाजिक परिवेश और मनुष्य की बदलती मानसिकता की ओर संकेत करते हैं। लेखिका परिवर्तन को केवल बाहरी घटना के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसके प्रभाव को संबंधों और मनुष्य के भीतर भी तलाशती हैं।विशेष रूप से ‘पहले इंसान बनें’ जैसी रचना का शीर्षक संग्रह की मानवीय चेतना को एक सूत्र में बाँध देता है। आधुनिक जीवन में जब पहचानें, भूमिकाएँ और सामाजिक विभाजन मनुष्य से उसकी सहज मानवीयता को दूर कर सकते हैं, तब कविता मनुष्य को उसके मूल रूप—‘इंसान’—की ओर लौटने का आग्रह करती है।

नारी-चेतना का स्वर

शशि कुड़ियाल की रचनात्मक दृष्टि में स्त्री केवल संवेदना की पात्र नहीं, बल्कि विचार और चेतना की सक्रिय वाहक है। ‘तब होगा स्त्री सशक्तिकरण’, ‘मेरी सासू माँ : एक जीवंत एहसास’, ‘मेरे पिता जी की बात अलग थी’ जैसी रचनाएँ पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को स्त्री के अनुभवों की दृष्टि से देखने का अवसर देती हैं। यहाँ नारी-विमर्श किसी नारे में बदलने के बजाय जीवन के अनुभवों से निकलता हुआ दिखाई देता है। इस संग्रह का यह पक्ष इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि लेखिका स्त्री के जीवन को केवल पीड़ा और संघर्ष के एकरंगी चित्र में नहीं बाँधतीं। उसमें माँ, बेटी, पत्नी, बहू, सास, प्रेमिका और संवेदनशील मनुष्य—अनेक रूप एक साथ दिखाई देते हैं। यही बहुआयामी दृष्टि संग्रह के नारी पक्ष को अधिक मानवीय बनाती है।

प्रकृति, स्मृति और लोकजीवन

कवयित्री की संवेदना केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहती। ‘सेमल का पेड़’, ‘वो पहली होली’, ‘खिलखिलाता मदमाता बसंत’, ‘सच्ची विरासत’ जैसी रचनाएँ प्रकृति, गाँव, ऋतु, उत्सव और स्मृतियों से जुड़ती हैं। विशेष रूप से ‘सेमल का पेड़’ जैसी रचना में प्रकृति महज दृश्य नहीं रह जाती; वह स्मृति और भावनात्मक संबंध का माध्यम बन जाती है।
इसी तरह गाँव, त्योहार और बचपन की स्मृतियाँ संग्रह में उस सांस्कृतिक संसार को जीवित करती हैं जो तेज़ी से बदलते समय में पीछे छूटता जा रहा है। इस दृष्टि से ‘कुछ दिल ने कहा’ में निजी स्मृतियाँ सांस्कृतिक स्मृति का रूप भी ग्रहण करती हैं।
आध्यात्मिकता और आस्था संग्रह में आस्था का स्वर भी पर्याप्त गहराई से उपस्थित है। आरंभिक रचनाओं में ‘अयोध्यापति हे रघुनन्दन’, ‘तमस के सिंधु से तारो माँ’ और आगे ‘श्रीराम भी कुछ कहते हैं’ जैसे शीर्षक धार्मिक-आध्यात्मिक संवेदना की ओर संकेत करते हैं। लेकिन यह आस्था जीवन से अलग कोई अमूर्त संसार नहीं बनाती; वह मनुष्य के भीतर प्रकाश, धैर्य, नैतिकता और आशा खोजने का माध्यम बनती है।

भाषा और शिल्प

शशि कुड़ियाल की भाषा की प्रमुख विशेषता उसकी सहजता और संप्रेषणीयता है। वे कठिन शब्दावली अथवा अत्यधिक अलंकारिकता के सहारे कविता को प्रभावशाली बनाने का प्रयास नहीं करतीं। भाव सीधे पाठक तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि संग्रह की अनेक कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कवयित्री पाठक से आमने-सामने संवाद कर रही हों।
यहाँ भाषा में कहीं-कहीं बोलचाल की सहजता है तो कहीं भावानुकूल काव्यात्मकता। कविताओं में छंदबद्धता का आग्रह सर्वत्र समान नहीं है; संग्रह का बड़ा हिस्सा मुक्त अभिव्यक्ति और भाव-प्रधान कविता की दिशा में जाता है। इस कारण इसकी शक्ति पारंपरिक छंद-कौशल से अधिक अनुभूति की प्रामाणिकता और भाव-संचार में दिखाई देती है।

कृति की विशेष उपलब्धि

‘कुछ दिल ने कहा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसकी कविताएँ अलग-अलग विषयों के बावजूद एक साझा संवेदनात्मक सूत्र से जुड़ी रहती हैं। प्रेम से लेकर पीड़ा तक, परिवार से लेकर समाज तक, प्रकृति से लेकर स्मृति तक और आस्था से लेकर मानवीयता तक—कवयित्री जीवन को टुकड़ों में नहीं, एक समग्र अनुभव के रूप में देखती हैं।
संग्रह का शीर्षक ‘कुछ दिल ने कहा’ इसलिए भी सार्थक है कि यहाँ ‘दिल’ केवल भावुकता का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनशील अंतरात्मा का प्रतीक बन जाता है। और उपशीर्षक ‘अंतस के स्वर’ उस आंतरिक संसार को स्पष्ट करता है जहाँ से ये रचनाएँ जन्म लेती हैं। संग्रह के अंतिम हिस्से में ‘अंतस के दो पल’, काव्य-सूक्तियाँ, शेर, ‘मुक्तक उपवन’, ‘प्रबुद्ध पाठकों से…’ और ‘पाठकों का कोना’ जैसे खंड जोड़े गए हैं। इससे पुस्तक केवल 60 कविताओं तक सीमित न रहकर कवयित्री की विविध काव्याभिव्यक्तियों का व्यापक संकलन बन जाती है।

निष्कर्ष

‘कुछ दिल ने कहा’ मूलतः संवेदना की पुस्तक है—लेकिन ऐसी संवेदना जो केवल स्वयं को सुनने के लिए नहीं, दूसरे के मन तक पहुँचने के लिए भी शब्द तलाशती है। शशि कुड़ियाल ‘चंद्रभा’ ने अपने अनुभवों, स्मृतियों, संबंधों, सामाजिक सरोकारों और जीवन-दर्शन को सरल और आत्मीय भाषा में अभिव्यक्त किया है। संग्रह की कविताएँ पाठक को चौंकाने की अपेक्षा उसे ठहरकर सोचने, अपने भीतर झाँकने और आसपास के जीवन को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
आज जब साहित्य के सामने संवेदना को बचाए रखने की चुनौती है, तब ‘कुछ दिल ने कहा’ का महत्व इसी में है कि यह पाठक को बताता है—दिल में उठी आवाज़ यदि सच्ची हो, तो वह केवल व्यक्ति की आवाज़ नहीं रहती; वह धीरे-धीरे समाज की आवाज़ बन जाती है। समीक्षा का निष्कर्ष यही है कि शशि कुड़ियाल ‘चंद्रभा’ का यह काव्य-संग्रह उनकी भाव-संपन्न रचनात्मक यात्रा का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है और सहज भाषा में मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार तथा जीवन के विविध रंगों को सामने रखने वाली पठनीय कृति के रूप में उल्लेखनीय है।